सुनाई पड़ता है तुम्हारा प्रस्ताव,
प्रस्ताव में छुपा आग्रह,
आग्रह में छुपी निंदा,
निंदा में छुपा विरोध,
विरोध में छुपी अस्वीकृति,
अस्वीकृति में छुपा हुआ बंटवारा,
रंग, नस्ल, मत, पंथ और जाति,
रूप, पद, धन, बल, और रूढ़ि,
संप्रदाय, भाषा, नर-नारी और पीढ़ी,
और न जाने कितने तरीकों से,
स्वयं श्रेष्ठता का अभिमान ।
और ये अभिमान, स्वीकार नहीं होता ।
सुनाई तो पड़ता है, अंगीकार नहीं होता ।

अभ्यास, आग्रह, मान्यताओं
कपोल कल्पित इन परीकथाओं पर,
आओ ज़रा बैठ कर,
खुले दिलो दिमाग से चर्चा कर लें,
सही हो जो, वहां हम मिलकर,
जिंदगी को खर्चा कर लें ।

शालिनी
2 जून 2024