• प्रथम भाग :

श्रम, सेवा और घोर विद्वत्ता,
उपलब्ध हुआ था अति सम्मान ।
ऐसे एक कुटुंब में जन्मी,
काल पुरुष मानव संतान ।१।

वेद समझने के उपरांत,
खड़ा रह गया एक सवाल ।
प्रतिरूप यदि सब मात पिता के,
तो मिथ्या, सत्य से जन्मा कैसे ?२।

एक नहीं थे, कई प्रश्न थे,
व्यवधान डालते बड़े प्रबल ।
जगते सोते चैन न आता,
मन में मच गई उथल पुथल ।३।

गुरु की आज्ञा तब पाकर,
हरने अपने मन की पीर ।
तैयारी तप की करने को,
निश्चय हुआ नर्मदा तीर ।४।

ज्ञान मिलेगा अब समाधि में,
था उनको पूरा विश्वास ।
वर्षों की कड़ी साधना से,
पूरी हुई समाधि की प्यास ।५।

‘मैं’ था, और उजियाला था,
पर नहीं उत्तरित हुए थे प्रश्न ।
करी प्रतीक्षा एक बरस तक,
शायद वे हो जाएं शमन ।६।

कैसे जांचे अब समाधि को,
रही सफ़ल या फिर असफ़ल ।
संयम की थी एक विधि पर,
सिद्धि की इच्छा नहीं सकल ।७।

योग सूत्र के एक वाक्य को,
स्वयं प्रेरणा से उल्टा कर ।
सोचा कुछ नए प्रयोग से,
शायद निकले कोई हल।८।

संयम करने का कर संकल्प,
‘आकाश’ तत्व का किया चयन ।
धारणा, ध्यान, समाधि नहीं,
समाधि, धारणा, ध्यान का क्रम ।९।

पाँच वर्ष तक किया अध्ययन,
तृप्ति हुई, हर्षाया मन,
न्याय, धर्म और सत्य दृष्टि में,
विलय हो गए सारे भ्रम ।१०।

  • द्वितीय भाग  :


एक गृहस्थ, हुआ मध्यस्थ,
ज़र्रा - ज़र्रा था तार - तार ।
सह अस्तित्व के अनुभव में,
उत्तरों की लग गई इक कतार ।११।

समाधान - समृद्धि सूत्र से,
छूट गया सारा बैराग ।
निकल गए सारे निष्कर्ष,
जागे, मानव जाति के भाग ।१२।

अंतर्मन में हुई प्रेरणा,
है सबका, इस पर अधिकार ।
बन निमित्त, मैं बहा दूँ गंगा,
प्रेम पूर्ण हो, यह उपकार ।१३।

लाभ नहीं है, समृद्धि है,
अस्तित्व में तो, आवर्तन है ।
पूरक होकर जीते हैं सब,
प्रकृति में तो, नर्तन है । १४।

समाधान से जुड़कर सब ने,
परिवार में प्रस्तुत किया प्रमाण ।
नित्य खुशहाली के वैभव से,
हुआ श्रेष्ठता का सम्मान ।१५।

स्वीकारा परिवार में सबने,
पूरक बनकर, जीने का लक्ष्य ।
खोल दिए दरवाजे अपने,
जिज्ञासु जीवनों के समक्ष ।१६।

नहीं अकेला कोई मानव,
परंपरा में सभी प्रतिष्ठित ।
हर संतान होगी ही जागृत,
शिक्षा यदि हो जाए व्यवस्थित ।१७।

अनुभव संपन्नता के फल में,
भाषा में थिरता स्वतः हुई ।
ज्ञान व्यक्त करने के हेतु,
परिभाषा ही प्रथम गढ़ी ।१८।

दर्शन, वाद, शास्त्र की रचना,
संविधान हुई अगली कड़ी ।
धीरे धीरे पूर्ण समर्पित,
लोगों की फिर भीड़ बढ़ी ।१९।

हुआ प्रवर्तन परम्परा में,
साधारण से लोगों से ।
समझे लोगों ने आगे बढ़कर ,
प्रस्तुति की जिम्मेदारी से ।२०।

शालिनी
१८/१२/२०२४