खोल आंखों को देखो न सोये रहो
जीने दो प्यार से और जीते रहो..
अपनी चाहों पे अपनी आशाओं पर
जीवन रहता अर्पित सदा हीं सदा..
अक्षय शक्ति और बल से जो है भरा
विषयों पर कैसे है अर्पित भला..
खोल आंखों को देखो न सोये रहो...
प्रिय हित लाभ का इक सफर जिंदगी
ऐसा माने चला है ये जीवन अभी..
कि इसी जीवन की ये भी संभावना
प्रिय हित लाभ की कर सके तुलना..
न्याय धर्म सत्य पर हो सके अग्रसर
जीवन के इसी छुपी आस पर...
तुल गया कोई नर्मदा के घाट पर
सुन के उसके हृदय की करूण पुकार..
हो गया अस्तित्व उस पर न्यौछावर
हो गया अस्तित्व उस पर न्यौछावर..
खोल आँखों को देखो न सोये रहो..
जीने दो प्यार से और जीते रहो..
गांव गांव गली गली वो कहने लगे
अपनी आशा पे जीवन है अर्पित सदा...
आदमी के हृदय की ये आदिम प्यास थी
गूँज उठी अब सदा न्याय धर्म सत्य की...
प्रिय हित लाभ का हो रहा संक्रमण
न्याय धर्म सत्य का हो रहा जागरण...
अक्षय बल अक्षय शक्ति से जो है भरा
क्योंकर विषयों पर होगा वो अर्पित भला...
इसकी आशा यही है इसकी चाह यही
न्याय धर्म सत्य मे है इसकी तृप्ति...
खोल आँखों को देखो न सोये रहो...
जीने दो प्यार से और जीते रहो...
हुई अब बहुत लाभ की कामना
हुई धरती हीं छलनी ओ रे मना...
कि चलो आओ अब चाह को मोड़ दें
जो बिछड़ के रहें अब उन्हें जोड़ लें...
ये सफर कोई गुमनाम सुनसां नहीं
नित्य प्रकृति का वैभव है खिलता यहीं...
खोल आँखों को देखो न सोये रहो...
जीने दो प्यार से और जीते रहो...
कि चलो तुलते हैं अब इस नयी आस पर
बोध अनुभव जागरण की नयी प्यास पर...
हर कदम अब हमारा उठे साथ साथ
होना रहना हमारा रहे साथ साथ...
हर व्यवस्था में सहीपन का आधार हो
एक सूत्र में सार्वभौम से परिवार हो...
खोल आँखों को देखो न सोये रहो...
जीने दो प्यार से और जीते रहो...
खोल आँखों को देखो न सोये रहो...
जीने दो प्यार से और जीते रहो...