अब कुछ स्वस्थ हूँ

हूँ के भास में
होने के प्रयास में
विषयों के विलास में
अब तक आश्वस्त था
बड़े ग़ज़ब का मस्त था!!

संवेदनाओं के चुनाव में
सुख दुख के बहाव में
समस्याओं के उलझाव में
अब तक त्रस्त था
अनजाने हीं ब़ड़ा व्यस्त था!!

आगत की तृषिता में
विगत की असफ़लता में
बड़ी सूक्ष्म हीनता में
किसी उधेड़बुन में रत था
अपने ही सवालों से पस्त था!!

किसी जागृत के पुकार ने
एक बुजुर्ग के दुलार ने
एक मासूम फटकार ने
चिर निद्रा को तोड़ दिया
जाने कैसे भीतर को मोड़ दिया!!

एक सुगंध है समाधान की
एक गीत है निदान की
एक दिशा है संधान की
उस प्यार के पुकार से
अनुभव हेतु प्रयासरत हूँ
कुछ स्वस्थ हूँ, अब कुछ स्वस्थ हूँ!!

निशि कांत

Nishikant ji

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