मैं सत्य से रुबरु हुआ :::

आभास में सबको ईश्वर का होना पता चला,
भक्ति में दिव्य मानव को ईश्वर मानना चला,
तो व्यक्तिवाद में मैं खुद एक इष्ट स्वरूप मान्यता का दौर चला,
एक सत्य अनुभव की वस्तु का कैसे रहस्यमय सिलसिला चला ?!

संसार की उत्पति इस ब्रह्म से होना कहां,
फिर ब्रह्म सत्य, तो उससे संसार को मिथ्या क्यों कहां!
ज़िंदगी की राह में न भक्तिवाद, न व्यक्तिवाद, न भौतिकवाद से उत्तर पूरा मिला,
जहां तक कितने महापुरुषों के निष्कर्ष साथ पाया,
वहां तक उत्साह तो बढ़ा, पर संसार के मिथ्यात्व का उत्तर नहीं पाया।

तब ” व्यापक ” शब्द याद आया, तो साधना क्रम बदलकर उसका शोध किया,
समाधि में अनुभव को संयम क्रिया से जोड़ा, तो शोध का सिलसिला पूरा किया,
व्यापक ही ईश्वर है जो नित्य है, और सारे अणु - परमाणु उसमें है ही, यह अस्तित्व का सही दर्शन हुआ,
समाधान में अनुभव से नित्य व्यापक का होना दिखा, तो रहस्य का स्थान नहीं रहा,
परमाणु इकाई - व्यापक ईश्वर का सह अस्तित्व में जीवन का होना प्रमाणित हुआ,
सुखी होने का आस्वादन, शांति, संतोष, आनंद का लक्ष्य साधना का सुखद फल रहा !!!

जब कोई रहस्यी वस्तु नहीं, तो उसे दिखाने - देखने का दर्शन विकल्प स्वरूप संभव हुआ,
ऐसे बाबाजी श्री अग्रहर नागराजजी का अनुष्ठान मध्यस्थ दर्शन वांग्मय लिखने से पूरा हुआ !!!

Neelmani ji

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