हम मानव

हम्म..............हम मानव.....!
जीवन भर....यूँ आस सुख की,
लगाए रखे हैं..........लगाए रखेंगे.. हम मानव......।
सर्वशुभ हेतु आगे अब सब ...
आने लगे हैं, आते रहेंगे...हम मानव।।

मिट्टी से ही जुड़ा ,सबका अस्तित्व,
मिट्टी से जुड़ी वृक्षों की जड़.....
वृक्षों पर फल, फूल भी हैं और साथ में है,पक्षियों का घर।।
आ.....
जीवन भर.........।।

अस्तित्व की व्यवस्था सुंदर...,
पहचान रहे हैं अब हम तुम ,
सह अस्तित्व में जीते सब प्राणी,
एक दूजे पर होकर निर्भर।
पशु पक्षी ढूँढते हैं आश्रय ,
फिर सो जाते भर अपना उदर।
पर मानव अब तक भटक रहा, क्या पाया नहीं अभी उत्तर?

आ............
जीवन भर........।।

पर सुख क्या है?
ये जाना नहीं....
समाधान भी तो पहचाना नहीं,
न्याय क्या है... जी पाया नहीं।
निष्ठा की आयी नहीं समझ ।
प्यास ज्ञान की बनी रही।
स्व निरीक्षण परीक्षण करना होगा,
विवेक सम्मत विज्ञान समझना होगा।।

आ.............
जीवन भर...........।।

जीवन ज्ञान...को पाकर ही,
प्रमाणित होंगे अक्षय बल,
अक्षय शक्ति की अभिव्यक्ति से ही ,
गवाही देगा सुख की मन।
सुख की आशा में ही चयन,
सुखापेक्षा में ही स्वागत- आस्वादन।
जीवन में अविभाज्य रूप से ही कार्यरत रहता है मन।।

आ.......
जीवन भर.......।।

सह अस्तित्व ही में है संतुलन,
नैसर्गिक, बौद्धिक, सामाजिक,
संकल्प हो जागृति के लिए,
आत्मानुगामी हो जाए मन,
हर संबंध में पवित्रता हो,
मानवीयतापूर्ण हो आचरण।
यत्न-सत्व समझ आए,
सही सही हो , मूल्यांकन।।
आ.........
जीवन भर..........।।

व्यवस्थात्मक आयाम प्रमाणित हो,
ऐसा परिवार में जीना हो,
अकेलेपन में क्या संबंध?
परिवार में सभी संबंध हैं ध्रुव,
सभी संबंध को पहचानें और मूल्यों का निर्वाह करें,
स्वराज्य स्वतन्त्रता को जानें ,
भागीदारी का निर्वाह करें।।
आ..........
जीवन भर..........।।
अध्ययन...
अध्ययनगामी विधि मिली है ,
हम समझकर,
एक सूत्रित हो जाएं।
स्वानुशासन परंपरा बन जाए,
जीवन जागृति प्रमाणित हो जाए।
सर्वतोमुखी समाधान प्रमाणित होने से....
सुख निरंतर हो जाए...
सर्व शुभ.........
सर्व शुभ के भाव निरंतर
आते रहे हैं...
आते रहेंगे.
सर्व शुभ 🙏🙏

लेखिका- सीमा यादव




…...........

गीत - “हम मानव ”

हम्म..............हम मानव.....!
जीवन भर....यूँ आस सुख की,
लगाए रखे हैं..........लगाए रखेंगे.. हम मानव......।
सर्वशुभ हेतु आगे अब सब ...
आने लगे हैं, आते रहेंगे...हम मानव।।

मिट्टी से ही जुड़ा ,सबका अस्तित्व,
मिट्टी से जुड़ी वृक्षों की जड़.....
वृक्षों पर फल, फूल भी हैं और साथ में है,पक्षियों का घर।।
आ.....
जीवन भर.........।।

अस्तित्व की व्यवस्था सुंदर...,
पहचान रहे हैं अब हम तुम ,
सह अस्तित्व में जीते सब प्राणी,
एक दूजे पर होकर निर्भर।
पशु पक्षी ढूँढते हैं आश्रय ,
फिर सो जाते भर अपना उदर।
पर मानव अब तक भटक रहा, क्या पाया नहीं अभी उत्तर?

आ............
जीवन भर........।।

पर सुख क्या है?
ये जाना नहीं....
समाधान भी तो पहचाना नहीं,
न्याय क्या है... जी पाया नहीं।
निष्ठा की आयी नहीं समझ ।
प्यास ज्ञान की बनी रही।
स्व निरीक्षण परीक्षण करना होगा,
विवेक सम्मत विज्ञान समझना होगा।।

आ.............
जीवन भर...........।।

जीवन ज्ञान...को पाकर ही,
प्रमाणित होंगे अक्षय बल,
अक्षय शक्ति की अभिव्यक्ति से ही ,
गवाही देगा सुख की मन।
सुख की आशा में ही चयन,
सुखापेक्षा में ही स्वागत- आस्वादन।
जीवन में अविभाज्य रूप से ही कार्यरत रहता है मन।।

आ.......
जीवन भर.......।।

सह अस्तित्व ही में है संतुलन,
नैसर्गिक, बौद्धिक, सामाजिक,
संकल्प हो जागृति के लिए,
आत्मानुगामी हो जाए मन,
हर संबंध में पवित्रता हो,
मानवीयतापूर्ण हो आचरण।
यत्न-सत्व समझ आए,
सही सही हो , मूल्यांकन।।
आ.........
जीवन भर..........।।

व्यवस्थात्मक आयाम प्रमाणित हो,
ऐसा परिवार में जीना हो,
अकेलेपन में क्या संबंध?
परिवार में सभी संबंध हैं ध्रुव,
सभी संबंध को पहचानें और मूल्यों का निर्वाह करें,
स्वराज्य स्वतन्त्रता को जानें ,
भागीदारी का निर्वाह करें।।
आ..........
जीवन भर..........।।
अध्ययन...
अध्ययनगामी विधि मिली है ,
हम समझकर,
एक सूत्रित हो जाएं।
स्वानुशासन परंपरा बन जाए,
जीवन जागृति प्रमाणित हो जाए।
सर्वतोमुखी समाधान प्रमाणित होने से....
सुख निरंतर हो जाए...
सर्व शुभ.........
सर्व शुभ के भाव निरंतर
आते रहे हैं...
आते रहेंगे.
सर्व शुभ 🙏🙏

लेखिका- सीमा यादव
Seema Yadav ji

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