।। ध्यानाकर्षण ।।
मन अगर भारी है तो
आभारी कैसे होंगे
संबंध का जो पूरा प्रयोजन है
“पूर्णता” वह कैसे पूर्ण होंगे
ईश्वर, नियम, न्याय, समाधान
ये सब पूर्ण है, न कम है, न ज्यादा
मानव होने का प्रयोजन अगर
नहीं समझे तो फिर क्या फायदा
स्वयं बौद्धिक इकाई होने के बावजूद
भौतिकता में अगर आसक्ति है मन में
तो हम “संबंध” को समझ नहीं पाये
“ब्रह्मानंद”,आत्मानंद अथवा चिदानंद तो
बहुत दूर की बात है
धनानंद होने की दौड में जिन्दगी
भर पछतावे ।।
निरोज
तारीख :18/12/2024
खरमुण्डा(बिजेपुर) बरगड (ओडिशा)