आओ करें इस पर विचार
क्या पाया और क्या खोया है?
लेने की खातिर सब तैयार,
क्या देने का भी सोचा है?
धरती से सब कुछ मिला हमें
क्या, हवा, क्या धूप या पानी है।
अब पूरक होकर जीने की
क्या बात किसी ने ठानी है?
क्या बात किसी ने ठानी है?
नज़र दौड़ायें जो चारों ओर
मिट्टी, पत्थर पौधे और ढोर
कैसे करते सब अपना काम
इसी में रहता इन्हें आराम
ना कोई झगड़ा ना कोई द्वेष
बढ़िया रखते अपना परिवेश ।
इक दूजे को खूब पहचाने
अस्तित्व विधि से चले निभाने ।
मानव भी है बड़ा सयाना
सबकी उपयोगिता को इसने पहचाना
यदि मानव शिक्षित हो जाये
प्रयोजन को वह जान ही जाये
अस्तित्व बना रहे हर वस्तु का
धर्म किसी का छूट ना पाए ।
धरती हो सदा समृद्ध
रहे जहां बच्चे,युवा और वृद्ध
समझदारी से धर्म निभाते
गठन से अपनी ताक़त बनाते
मानवीयता हर जगह फैलाते
ना रहता आतंक और भय
समझते समझाते हो निर्भय ।
इस धरती को समृद्ध बनाते
अखंड समाज अवधारणा सजाते
सार्वभौम व्यवस्था अपनाते
अस्तित्व सहज दर्शन हो पाते।
कठिन नहीं , यह काम आसान
सह अस्तित्व सदा है भासमान ।

Neeru Puri ji

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