प्रकृति का अद्भुद यह रूप ,
आसमान से छलकती वह धूप।
पेड़ो की वह कोमल छाया ,
प्रकृति की यह गज़ब काया
कभी चिड़िया की चहचहाहट,
कभी कलियों की महकी आहट
कभी वर्षा की वह ठंडी फुवार,
कभी पेड़ो से आती वह ठंडी बवार
संपृकतता का यह अनंत संसार
धरती पर लाता संपदा अपार।
प्रकटन होता स्वयं प्रकृति का
ना कोई बनाता ना करता संहार ।
इस व्यवस्था को है अब समझना ,
समझकर इसमें जीकर दिखाना
यदि हम करें ना कोई हस्तक्षेप

  • रोकें खनन , बंद करें आक्षेप ।*

प्रदुषण की वजह सब मिट जायेंगी उजाले की किरण तक चमकायेगी
जिस पर अंधेरा है आज छाया।
पलट जाएगी फिर से उसकी काया
रखना होगा दूर अपने स्वार्थ को ।
लाकर खुद मे मानवीयता के भाव को,
तब ही होगा अपना सपना साकार ।
स्वच्छ व शांत दिखेगा यह अद्भुत संसार ।

Neeru Puri ji

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