” माँ की शिक्षा”


ये धरती, ये पर्वत, ये अंबर ,ये दरिया .......
लहलहाती ये फसलें, ये पेड़ों की छैयां.......!

..रंभाती वो गैया............पुकारे है...मैया........
‘सुनो रे सुनो.......ज़रा देखो तो ....इनको..,
सुनो रे सुनो.......ज़रा देखो तो ....इनको.................
कितनी सुंदर सजी है.........स्वतः ही ....ये दुनिया.....!!!
न आपस में ...ये पक्षी... हैं झगड़ते..,
न ही .. वृक्ष...कभी अपना फल ही बदलते ,
व्यवस्था से सजी प्रकृति देखो... बिटिया....!!
तितली.. वो फूलों पर ... दाना चुगती ये चिड़ियां !!!
लहलहाती .....ये फसलें , ये ........पेड़ों की छैयां!!!

पहचानोगे तो...धरती ..नहीं है ......अलग ये,
फिर क्यों मानसिकता में है द्वेष ?क्यों नहीं पूरकता???
करें चाहे .......जो ....भी कर्म... हम.. ये ......समझो ....
अभ्यास में हो ...... नियम - त्रयता ..........................!!
पढ़ाई करो.....,तो ....तुम, ...यह भी समझना........
उपयोगिता से ही....... है , अपना .....जीना............!!
पहले समझना....है...., फिर..... ये समझाना......कि.....
जुड़ी .....हुई.... है ...कैसे......इक दूजे से दुनिया!!!कितनी सुंदर सजी है.........स्वतः ही ....ये दुनिया.....!!!


परायापन .....ही... सारी ...पीड़ाओं की जड़.... है,
जबकि सबकी एक है धरती....... एक ही अंबर है !!
यही है ....समझना , ...समझकर.. के ..जीना .......!!
सभी सोचें ऐसे... कि... रिश्ता है सबका..............,
पहचानें ज़रा ...कि जैसा है घर मेरा..वैसा है सबका!!!
ममता है सब ही में....., है सब में स्नेह भी......पर.....
...खुद को परखना... कि क्यों न .... विश्वास जमता  ???
यही तो ...आधार है.......... हर .....संबंध... का........!!!
पहले समझो खुद को.........फिर समझो ...दुनिया......
सभी का है जंगल, ....सभी का है दरिया ............!!!
व्यवस्था से.... सजी ...प्रकृति देखो... बिटिया....!!!

सभी ने किया मिलकर........., जहाँ पहुँचे हैं हम........,
विचारेंगे..........!! विचारेंगे तो...... पहचानेंगे कृतज्ञता!!!
जीना तो तब है ....., जब मैं समझकर जीऊँ .......!!!
ऐसे सिर्फ शब्दों से ........ कैसे समझाऊँ...गौरवता???
जीना है संग - संग सह अस्तित्व में,छोड़ो ये अहमता !!!
.........सीखो यही है......., सच्ची मानवता ..........!!!
..........सब जिएं सुख से....,हो सबमें अनन्यता .!!!
....नियम समझें ,... न्याय समझें..., तभी सामरस्यता!!!
अखण्ड है ...समाज ..., समझनी है..., सार्वभौमता...
अखण्ड है ...समाज ....., समझनी है...., सार्वभौमता!!!
ये धरती, ये पर्वत, ये अंबर ,ये दरिया .......,
लहलहाती ये फसलें, ये पेड़ों की छैयां.......!!!
जुड़ी .....हुई.... है ...कैसे......इक दूजे से दुनिया!!!कितनी सुंदर सजी है.........स्वतः ही ....ये दुनिया.....!!!
सभी का है जंगल, ....सभी का है दरिया ............!!!
व्यवस्था से.... सजी ...प्रकृति देखो... बिटिया....!!!
....नियम समझें ,... न्याय समझें..., तभी सामरस्यता!!!
अखण्ड है ...समाज ..., समझनी है..., सार्वभौमता...!!!


Written by Seema Yadav
Teacher in Delhi
Residence in Faridabad (Haryana)

Seema Yadav ji

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