कचरा

प्रकृति का नियम अटल, चक्र चलाता है,
पत्ते गिरते, मिट्‌टी से उर्वरक पाता है।
जीव-जंतु, पशु-पक्षी, सब मिलकर रहते,
प्रकृति के संतुलन को बनाए रखते।

मानव भी तो प्रकृति का अंश है,
पर स्वार्थ में अंधा, विनाश का वंश है।
कचरा फैलाया, धरती को दूषित किया,
विचारों में भी मैल, संघर्षों को जिया।

स्वार्थ के वशीभूत, शोषण करता है,
प्रकृति के नियमों को तोड़ता है।
समझदारी से दूर, विनाश का मार्ग चुना,
धरती को नरक, जीवन को रुला दिया।

ए. नागराज जी ने दिया है ज्ञान,
सह-अस्तित्व का, जीवन का मान।
विचारों के कचरे को साफ करना होगा,
मानव को देवता, धरती को स्वर्ग बनाना होगा।

धर्म सफल हो, सुख-समृद्धि आए,
हर प्राणी सुखी जीवन पाए।
मानव बने देवता, धरती बने स्वर्ग,
यही हो हमारा लक्ष्य, यही हो हमारा मार्ग।

--- विनोद म्हात्रे


Vinod Mhatre ji

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