मानसिक स्थिरता और ज्ञान
विवशता मानव का स्वत्व नहीं है इस बिंदु पर स्थिरता को ज्ञान को पहचानने का प्रयासहुआ
उसमें कुछ बिंदु भर कर आए और उनके दर्शन के प्रकाश में उत्तरों को मैं यहां पर रख रही हूं
पहले बिंदु है
शिक्षित होना दर्शन के प्रकाश में कैसे हैं
दर्शन के प्रकाश में मानव चेतना को पहचाना ही शिक्षित होना है
और अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था के अर्थ में भागीदारी ही मानव चेतना है
दूसरा बिंदु था मन हमारे नियंत्रण में नहींहै
उसका उत्तर दर्शन के प्रकाश में था कि की लक्ष्य मूलक आस्वादन स्पष्ट है
तो मूल्य मूलक और रुचि मूलक आस्वादन भी स्पष्ट रहते हैं
इस प्रकार मन नियंत्रित हो जाता है या ज्ञान के प्रकाश में संयमित हो जाता है
तीसरा बिंदु था स्वयं के लिए निर्णय लेना या बच्चों के लिए निर्णय लेना
स्वयं के लिए निर्णय लेने में हिचकिचाहट है बच्चों के लिए निर्णय लेने में दृढ़ता है
उसका उत्तर था कि ऐसी मान्यता है कि स्त्री केवल परिवार के लिए बनी हुई है इसलिए मान्यताओं के चलते अपने को मानव रूप में पहचान ना होने के कारण
यह अंतर्द्वद की स्थिति बनी रहती है
इसलिए मानव चेतना की स्पष्टता परिवार और समाज में प्रयोजनमूलक संवाद के साथ
इस प्रकार के द्वंदो से मुक्त हुआ जा सकता है
चौथा बिंदु था क्रम को पहचानना है
पहले श्रवण फिर मनन के साथ वैचारिक रूप से स्पष्ट होने के साथ ही
संवाद विधि पहचानने में आती है
प्रयोजन के अर्थ में संवाद अभी हम लोगों को खुश करने के अर्थ में संवाद करते हैं यह ठीक नहीं है
भ्रमित मानव दुखी ही रहता है
अतः प्रयोजनमूलक संवाद के द्वारा सही के प्रति ध्यानाकर्षण करने से सही कैसे कृति के साथ वह सुखी भी हो सकता है
यह विश्वास स्वयं में होना की सत्य को हम कह रहे हैं
सत्य सार्वभौमिक होता है मेरा तेरा नहीं होता है
सत्य को पहचानना भी आवश्यकता है
पांचवा बिंदु था की ससुराल में परतंत्रता जैसा लगता है क्योंकि अपने मन का करने का अवसर नहीं रहता
इसका उत्तर दर्शन के प्रकाश में है की स्वतंत्रता वैचारिक तथ्य है
और प्रायोजन के अर्थ में निर्णय लेने के साहस को स्वतंत्रता कहते हैं
वीरता का मतलब है सहनशीलता के साथ किया गया निर्णय
यही साहस है सत्य को लोग नाराज हो जाएंगे इस आधार पर सोच करके व्यक्त नहीं किया जा सकता
छठा बिंदु था संस्कार में क्यागड़बड़ है
उसका उत्तर दर्शन के प्रकाश में है कि आदर्शवादी ,भौतिकवादी विधि से व्यक्तिवादी संस्कार रहते हैं व्यक्तिवादी निर्णय रहते हैं परिवारवादी नहीं रहते हैं समाज व व्यवस्था बदी नहीं रहते हैं
इसलिए सभी संस्कार मानवीय चेतना के अर्थ में है
अभी जागृति क्रम है ऐसा कहकर हम निर्णय से बचते हैं
उसका उत्तर यह है कि कई बार गलती करके भी सीखते हैं दिन निर्णय सही नहीं है तो आगे सही करेंगे पर जागृति क्रम में निर्णय ही लगे यह तो ठीक नहीं है
अभी चार विषय पांच संवेदना में जीना बनता है
ऐषणा को सर्वशुभ मानसिकता के अर्थ में देखकर प्रयोजन के अर्थ में संवाद किया जा सकता है
और सर्व शुभ के अर्थ में निर्णय लिए जा सकते हैं उन पर प्रश्न नहीं खड़ा हो सकता
सभी निर्णय पूर्णता के अर्थ में है संबंधों का निर्वाह भी पूर्णता के अर्थ में है
पूर्णता मानव का लक्ष्य है संबंध या पूर्णता के लक्ष्य के अर्थ में संबंधों का निर्वाह होता है
संवाद की स्थिति बने यह प्रयास आवश्यकहै
कई प्रयासों के दुरगामी परिणाम आते हैं उनके प्रति आश्वस्त रहना होता है
यह फल परिणाम की स्पष्टता के साथ ही दूरगामी निर्णयों की क्षमता आती है
निर्णय का आधार नियम होगा घटना नहीं होगी यह महत्वपूर्ण तथ्य आज की चर्चा में निकल कर आया
निर्णय से ग्लानि में जाने की बजाय उस निर्णय के फल परिणाम के प्रति जिम्मेदारी को स्वीकार करना होगा
और उन सभी स्थितियों से निपटने के लिए तैयार रहना होगा जो ऐसे निर्णय के साथ भावी होते हैं
गलत निर्णय को सुधारे जाने की स्थिति के साथ ही आप गति कर सकते हैं
मैंने गलत ना हो जाए इस तरीके से तो कभी निर्णय लेने की क्षमता का विकास ही नहींहोगा
लेकिन समझ कर सारे निर्णय लिए जाएं फल परिणाम के आश्वस्ति के साथ लिए जाए तो
मानव परंपरा में निश्चित एक सार्थक भागीदारी को हर नर नारी सुनिश्चित कर पाएंगे
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