- कमल *
किसी की बुराई क्यों करू?
खुद ही को अभी ठीक से जाना नहीं।
खुद के मैल धो ले बंदे,
इसके सीवाय कोई चारा नहीं।
समझ सुईं की इतनी सी है
उपर ढेर सारा चारा है,
ढुंढते ढुंढते बित जाएगा जीवन,
क्यों अहंकार का मारा है?
जीवन चले रे झरझर झरझर,
सुख रहीं जीवन की धारा है।
संभल सके तो संभल प्यारे,
मिटा भ्रम, फिर उजियारा है।
मध्यस्थ दर्शन के साथ हो चल,
परंपरा में घना अंधियारा है।
विकल्प, मार्गदर्शन हर प्रश्नों के उत्तर,
ये दर्शन बड़ा ही प्यारा है।
कच्चा है मटका, दु:ख की है अग्नि,
खुब तपा है परंपरा में।
धीमे धीमे तपता जा अभी,
मध्यस्थ दर्शन की रोशनी में।
अपनी योग्यता से भी अधिक
ज्ञान मिलेगा,
कीचड़ में भी कमल खिलेगा,
कमल खिलेगा।
— विनोद म्हात्रे
(मध्यस्थ दर्शन सह- अस्तित्ववाद की रोशनी में)