विगत का इतिहास देखें तो पता चलता है की जान माल की सुरक्षा के आश्वासन के साथ राजगद्दी का प्रादुर्भाव हुआ ।सद् प्रवृत्तियों के आश्वासन के साथ धर्म गद्दियों का प्रादुर्भाव हुआ आदिकालीन संघर्षों से बचने के लिए मानव ने कबीला वा ग्राम बनाए कृषि के विकास के साथ यायावरी जीवन का पटाक्षेप हुआ व मानव एक जगह निवास करने लगा इसके साथ ही परिवार संस्था का भी विकास हुआ जो वर्तमान तक सूत्रित है। क्योंकि मानव चेतना की सार्वभौमिक व्याख्या वर्तमान तक धर्म गद्दी शिक्षा गद्दी में उपलब्ध नहीं है। आदर्शवादी ,भौतिकवादी विचारधाराएं मानवता को परिभाषित करने में असमर्थ रही इस कारण से मानव अपने मौलिक स्वरूप को पहचान नहीं पाया जिसके कारण से द्रोह, विद्रोह ,संघर्ष ,युद्ध में जीने के लिए मानव परिवार से लेकर समुदाय तक संघर्षरत है। अभी जब हम वसुधा कुटुंब की बात कर रहे हैं तो इस धरती पर 4 अवस्थाओं की अविभाज्य ता में मानव जाति विद्यमान है ।पदार्था अवस्था प्राण अवस्था जीवअवस्था और ज्ञान अवस्था इन चारों के साथ धरती का अविभाज्य वर्तमान साफ दिखाई देती है। इन चारों वास्तविकताओं का प्रयोजन भी दिखाई देता है मानव अभी जीव चेतना में जीवो के सदृश्य जी रहा है इसलिए आहार ,निद्रा भय मिथुन इन विषयों के आसपास ही मानव मानसिकता से लेकर के परिवार ,समाज ,राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय धर्म नीति अर्थ नीति ,राजनीति सभी में 4 विषयों के आधार पर कार्यक्रमों का स्वरुप है। जबकि हम देखते हैं कि परिवार में न्याय, सम्मान की अपेक्षाएं प्रतीक्षित है? न्याय के स्वरूप को समझना आवश्यक है तभी हम इस बात को समझ पाएंगे की धर्ती एक कुटुंब है हर मानव संतान समाधान का अपेक्षा रखता है वह हर परिवार में समृद्धि आवश्यक है। समाधान संपन्न हर मानव संतान अपने को परिवार अविभाज्यता में परिवार को समाज के अविभाज्यता में समाज को राष्ट्र की और राष्ट्र को अंतरराष्ट्रीय अविविभाज्यता में देख पाता है, तभी परिवार में जो समाधान समृद्धि की आवश्यकता है वह एक परिवार अकेले पूरा नहीं कर सकता है यह बात ,समझ आती है इसीलिए समाज की आवश्यकताअनिवार्य है समाधान व समृद्धि सुलभता के लिए समाज की आवश्यकता है अभी समुदाय मानसिकता में यह सब होना संभव नहीं इसलिए अखंड मानव मानसिकता को पहचानने की मानव चेतना को पहचानने की अनिवार्यता है मानव की सभी समस्याओं का स्रोत मानव में निहित अमानवीयता ही है ।इसलिए मानव ना केवल व्यक्तिगत रूप से दुविधा द्वंद में ग्रस्त है परिवार में भी संघर्षरत है समुदाय में तो है ही इस कारण कुटुंब जैसी कल्पनाएं ,अवधारणाएं उस स्वरूप को नहीं पा पा रही हैं जिसकी अपेक्षा में मानव वर्तमान तक जी रहा है।कृषि का अर्थशास्त्र कुछ हद तक भौतिक आवश्यकताओं के आधार पर मानव को संगठित कर पाया जिसे कुटुंब कहा गया लेकिन भौतिकवादी विचारधारा के प्रभाव में नौकरी की मानसिकता में परिवार व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई। संबंध के पहचान ना हो पाना व समृद्धि के पहचान ना हो पाना यही तो कारण है जिसके कारण से मानव विखंडित हुआ मानव मानसिकता में संबंध की सार्वभौमिक पहचान जीने में समृद्धि का प्रमाण यही मानव मानसिकता है प्रयोजन में जिए बगैर प्रयोजन को पहचाने बगैर मानव कुटुंब मानसिकता में जी नहीं पाएगा इस पर विस्तार से चर्चा की आवश्यकता है व मानव को परिवार की अविभाज्य इकाई के रूप में हर परिवार को समाज की अविभाज्य इकाई के रुप में पहचानने की आवश्यकता है। तभी वसुधा कुटुंब है यह उद्घोष सफल हो पाएगा।
विगत का इतिहास
Sunita Pathak ji