आचरण ही कुटुंब शिक्षा का आधार

परिवार बड़ी जिम्मेदारी की छोटी संस्था है

जो अपने मैं समग्रता को समाए हुए हैं जन्म के साथ ही मानव संतान की शिक्षा दीक्षा कुटुंब में प्रारंभ हो जाती है। अभी जब मानव अपने मानव होने के स्वरूप को सार्वभौमिकता में पहचान नहीं पाया है, तब भी कृषि युग के विकास के साथ मानव परिवार में रहने लगा व संबंधों के ताने-बाने को पहचानने लगा व वर्तमान तक परिवार संस्था कार्य कर रही है।

वर्तमान में  दुविधा द्वंद के बीच भी मानव संतान को न्यूनतम आश्वासन परिवार में ही मिलता है; इसलिए परिवार की महत्ता स्वयं सिद्ध है। समकालीन राजनैतिक, वैचारिक आंदोलनों के बीच भी आज भी कुटुंब मानव के आशवस्ति पूर्वक जीने की जगह के रूप में गतिमान है ।

वर्तमान में परिवार संस्था बिखरने के क्रम में है सामाजिक ढांचा  टूटन ,विघटन के कगार पर है जिसके लिए हम सभी चिंतित हैं इसका उत्तर हमें कुटुंब शिक्षा में ही दिखाई देता है ।

परिवार ही शिशु की प्रथम पाठशाला है, जहां वह संबंधों में जीना सीख ता है जहां वह तन, मन ,धन का अर्पण -समर्पण सीखता है। जहां वह संबंधों का निरंतर निर्वाह होते हुए देखता है जो भी कुछ एक शिशु जन्म से लेकर मृत्यु तक  सीखता वह परिवार में ही प्रमाणित करता है वह परिवार में ही सीखे व समझे हुए के अनुसार जीता है।समाज व शिक्षा संस्थायें प्रकारांतर से परिवार का ही स्वरूप है।
भरण पोषण के संदर्भ में सीखना होता है वह संबंधों में जीना सीखना उसे समझना कहते हैं ।इस बात की भी स्पष्टता आवश्यक है, कि सीखना और समझना दो भिन्न वस्तुएं हैं ।

सीखने से हम भरण-पोषण योग्य बनते हैं ,समझने से संबंधों के निर्वाह योग्य बनते हैं ।इसलिए समाधान, समृद्धि कुटुंब शिक्षा के आधार है।

भौतिकवादी विचार के प्रभाव में परिवारों में जो जीने की शिक्षा मिलती थी उसका ताना-बाना वर्तमान में शिथिल पड़ गया है अतः वर्तमान में यह महती आवश्यकता है कि बच्चों की शिक्षा कैसी हो या मानव संतानों की शिक्षा कैसी हो इसकी स्पष्टता भी आवश्यक है।
अभी तक मानव जाति में  विचार के दो बड़े प्रयोग हुए हैं जिसके आधार पर शिक्षा व्यवस्थाएं बनी है । एक है भौतिकवादी शिक्षा दूसरी आदर्शवादी शिक्षा यह दोनों विचारधाराएं मानव को ना तो मानव के साथ जीने की समझ दे पाए ना ही प्रकृति के साथ जीने की? अतः मानव मानव के साथ कैसे न्याय पूर्वक जिए और प्रकृति के साथ कैसे नियम पूर्वक जिये, इस प्रकार शिक्षा की आवश्यकता है।
मानव के संपूर्ण जीवन का क्रियाकलाप व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र ,अंतर्राष्ट्रीय सीमा तक है वर्तमान भूमंडलीकरण के दौर में जिस प्रकार से दुनिया सिमट गई है वसुधा कुटुंब है ऐसे उद्घोषों की सहसा याद आती है। भारतीय दर्शन परंपराओं में जिस सर्व शुभ की कामना की गई है व वसुधा को कुटुंब के स्वरूप में जिस प्रकार से हमारे पूर्वजों ने पहचाना था जो ज्ञान ,विवेक, विज्ञान से संबंधित मामले रहे हैं उन्हें वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तार्किकता बौद्धिकता और व्यावहारिकता के साथ समझे जाने की आवश्यकता है। वर्तमान तक मानव जाति ने ज्ञान ,विवेक और विज्ञान के क्षेत्र में ही संपूर्ण कार्य किया है; ज्ञान का संबंध मूल प्रवृत्तियों से है मानव की मूल प्रवृत्तियां असंग्रह, स्नेह, विद्या सरलता व अभयता ही  है।

असंग्रह ,स्नेह सरलता, अभयता मानव मानव के बीच विश्वास के फलित होने के लिए यह अनिवार्य माना गया, पर समृद्धि का स्वरूप स्पष्ट ना होने से मानव जाती असंग्रह में जी नहीं पाई स्नेह के  सार्वभौमिक स्वरूप की स्पष्ट पहचान वर्तमान तक नहीं हो पायी है .मानव शिशु को सहयोग, सहकार ,सहभागिता की शिक्षा सहयोग ,सहकारिता सहभागिता पूर्वक देकर उसे स्नेह कि शिक्षा से शिक्षित किया जा सकता है ।
विद्या को निपुणता, कुशलता व पंडित के रूप में समझा जा सकता है पांडित्य का अर्थ है बौद्धिक नियम जो असंग्रह, स्नेह विद्या, सरलता, अभयता के रूप में है उनमें जीना ही पांडित्य है।

जिससे मानव संतान मानव के साथ संबंधों के निर्वाह में सफल होती है ।व परिवार समाज में परस्पर विश्वास का वातावरण बनता है। सरलता सामाजिक होना ही है समाज मानसिकता के लिए मानव को ग्रंथि व तनाव से मुक्त होकर जीने की शिक्षा से मानव शिशु को संस्कारित किया जा सकता है ।यह ग्रंथियां दुविधा, द्वंद्व, द्वेष, प्रतिस्पर्धा, छल ,कपट ,दंभ पाखंड है ।

इन से मुक्त होकर ही मानव सामाजिक जीवन में सफलता पूर्वक जी सकता है ।इसलिए सरलता की शिक्षा भी आवश्यक है अभयता स्वयं में विश्वास के रूप में ही सफल है।

मानव संतान को संबंधों की शिक्षा पूर्वक परिवार, समाज में अपनी भागीदारी जिम्मेदारी को सुनिश्चित करने योग्य शिक्षा के द्वारा हर घटना व क्रिया के कारणों को व निदानों को पहचानने योग्य बनाकर स्वयं में विश्वास संपन्न बनाया जा सकता है। वर्तमान में मानव संतान 25 वर्ष के शिक्षा के बाद जब वह निकलता है तो नौकरी पाने का आश्वासन भी परिवार समाज उसे पूर्ण रूप से नहीं देता 🤔🤔🤔अतः इस विपदा से निकलने के लिए हर मानव संतान को श्रम पूर्वक भौतिक संसाधनों को जुटाने योग्य बनाने की शिक्षा की आवश्यकता परिवार व समाज में है।

जब हम परिवार में शिक्षा की बात कर रहे हैं तब यह समझना जरूरी हो जाता है कि हम जो शिशु के या बालक के अभिभावक व शिक्षक हैं उनके आचरण में भी वे सभी शिक्षाएं प्रमाणित होना चाहिए जो भी वे अपने शिशु को व बालक को दे रहे हैं।

यदि ऐसा नहीं है तो शिशु के वाह्य वातावरण के प्रभाव में आकर भटक जाने की पूरी संभावना है ।इसलिए जब हम कुटुंब शिक्षा की बात कर रहे हैं जो घर में दी जा रही शिक्षा है व विद्यालयों में दी जा रही शिक्षा है यदि इन दोनों में एकरूपता नहीं हो तो कुटुंब शिक्षा सफल नहीं होगी ।

वर्तमान का संकट यही है कि घर में आदर्शवादी शिक्षा है विद्यालयों में भौतिकवादी शिक्षा है जिससे बालक दुविधा द्वंद का शिकार होकर अवसरवादी मानसिकता को अपना लेता है, जिससे स्वयं से लेकर परिवार, समाज, राष्ट्र ,अंतर्राष्ट्र तक वह समस्या के स्रोत के रूप में गमन करता है ।

अतः मानवीय संबंधों की शिक्षा शिक्षा के मानवीकरण द्वारा ही हो सकती है जिससे विचार, कार्य, व्यवहार की एक सूत्र ता में जीने योग्य विवेक का उदय हो सके। इसी के साथ विज्ञान शिक्षा की दिशा को भी पहचानने की आवश्यकता है क्योंकि विज्ञान के प्रयोग से मानव जाति प्राकृतिक दुष्प्रभावों को झेल रही है अतः विज्ञान शिक्षा के प्रयोजन को पहचानने की आवश्यकता है। जिससे मानव जाति रितु संतुलन  को बनाए रखते हुए उत्पादन प्रक्रियाओं को सुनिश्चित कर सके ।आदिकाल से वर्तमान तक ज्ञान ,विवेक, विज्ञान क्षेत्र में जो कार्य किया है पर ईर्ष्या द्वेष से मुक्त मानसिकता में जीने की मानव की आदिकालीन कामना पूर्ण नहीं हुई है, व्यवस्था में जीने की कामना पूरी नहीं हुई है।

अतः ज्ञान ,विवेक, विज्ञान शिक्षा को सार्वभौमिक स्वरूप को  पहचानने जाने की आवश्यकता है ।
जिससे शिक्षा के स्वरूप की स्पष्ट पहचान हो सके, शिक्षा के सार्वभौमिक स्वरूप को  हर मानव संतान हर देश काल में स्वीकार सके समझ सके जी सके इस योग्य सार्वभौमिक शिक्षा की कुटुंब शिक्षा में आवश्यकता है ।इससे कम में शिक्षा का मानवीय कारण नहीं होगा ।

  सार्वभौमिक शिक्षा मानव की मानसिकता में मानवीय गुणों का विकास करने में सफल होगा ,क्योंकि वर्तमान में हम चाहे या ना चाहे अस्तित्व समग्र रूप में अविभाज्य ही है ।
भूमंडलीकरण के दौर में जिस प्रकार से हम विभिन्न राष्ट्रों की परस्परत मे अविभाज्यता में जी रहे हैं उसको अनदेखा नहीं किया जा सकता।
इसलिए शिक्षा के सार्वभौमिक स्वरूप की पहचान की भी आवश्यकता है।  जो तार्किक, बौद्धिक और व्यवहारिक तीनों स्तरों पर सफल हो सके ।
और मानव मानसिकताओं के परिमार्जन में सफल हो सके भौतिकवादी और आदर्शवादी मानसिकता जो व्यक्तिवाद को जन्म देती है उसकी जगह ऐसी सार्वभौमिक शिक्षा  जो मानव में मानवीय गुण जैसे सहकारिता ,सहयोगिता ,सहकारिता, स्नेह, प्रेम, विश्वास जैसे मूल्यों की स्पष्ट पहचान करा सके।

ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जिससे मानव स्वयं में विश्वास में जी सके व परस्परता में विश्वास को स्थापित करने में सफल हो। प्रकृति के साथ संबंधों के निर्वाह में सफल हो स्वयं से लेकर के परिवार, समाज, राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय तक समाधान के स्रोत के रूप में गतित हो सके।
इस प्रकार की शिक्षा की पहचान करने में यदि हम सफल होते हैं तो कुटुंब शिक्षा भी सफल होगी ऐसी शुभकामनाएं आदिकाल से वर्तमान तक भारतीय मानस पटल में सर्वे भवंतु सुखिनः और वसुधा कुटुंब के उद्गार के साथ नित्य प्रति हमारी मानसिकता ओं को आंदोलित करती है। हमारी यह सार्वभौमिक शुभकामना सफल हो ऐसी शिक्षा को पहचाने जाने की आवश्यकता है तभी कुटुंब शिक्षा सफल होगी जो परिवार से लेकर समाज राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय तक समाधान को संप्रेषित प्रमाणित करने में सफल होगी।

Sunita Pathak ji