आदिकाल में जब मानव का अवतरण इस धरती पर हुआ, तब से आज तक मनुष्य ने अपनी समस्याओं के हल के लिए दो तरह से प्रयास किए, पहला जीव जानवरों से जो भी भय था उससे निपटने दूसरा मानव को जो मानव से भय था उससे निपटने के लिए मानव जाति ने राजगद्दी बनाई ।

इसी के साथ अपने अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर को पाने के लिए व प्रकृति के रहस्यों को समझने के लिए जिन मानव संतानों पर भरोसा किया वे सभी धर्माचार्य कहलाए व धर्म गद्दी बनी ।इन दोनों गद्दियों के प्रति मानव को जिम्मेदार बनाने के लिए शिक्षा गद्दी का विकास हुआ।

मानव के भरण-पोषण के लिए व्यापार गद्दी अस्तित्व में आई। आदि काल से आज तक मानव इन चार गद्दियों में समर्पित होकर अपने कार्य व्यवहार को सुनिश्चित परिमार्जित करने के प्रयास में है। ये सब मान्यता के रुप में ही हैं।

भौतिक रासायनिक जगत जिससे मानव का आहार व आवास सुलभ होता है, उसके क्रियाकलापों पर मानव को भरोसा है पर मानव जिन दैवी सत्ताओं में विश्वास करता रहा है वे आज तक रहस्य में ही है।

विज्ञान के क्षेत्र में भी मानव ने जो अध्ययन किया व अस्तित्व की उत्पत्ति के संदर्भ में जितने भी सिद्धांत है अभी तक प्रमाणित नहीं हुए हैं। उन पर प्रश्नचिन्ह लगे हुए हुए हैं ।अतः विज्ञान भी मान्यता पर ही आधारित है।

मानव जाति ज्ञान को पहचानती नहीं व्यवहार को पहचानती नहीं विज्ञान से जो परिणाम आए हैं वह ज्ञान है ऐसा प्रमाणित नहीं हुआ क्योंकि जिससे समस्या निकले उसे ज्ञान नहीं कहते ।इस पर तो हम सभी सहमत हो सकते हैं ।

विज्ञान का जो प्रयोग धरती पर हुआ उससे धरती समस्या ग्रस्त हो गई है व मानव के अस्तित्व पर ही संकट आ गया है। अतः विज्ञान वादी ज्ञान को भी ज्ञान नहीं कह सकते हैं ।

मानव जाति ने आदर्शवादी चिंतन किया जिसमें यह माना गया कि धरती के अस्तित्व व मानव के अस्तित्व के मूल में कोई सत्ता है जो सभी क्रियाओं को नियंत्रित करती है। पर वह सत्य क्या है यह अभी नियंत्रण क्या है यह मानव जाति के अनुमान में है मानव से जान गया है ऐसा अभी तक प्रमाणित नहीं हुआ है।


इसके उत्तर में मानव जाति ने जिस भौतिकवादी विचार को अपनाया जिसे परमाणु के क्रियाकलाप के आधार पर व्याख्यायित किया गया ,जिससे आंतरिक संघर्ष वा वाह्य संघर्ष को अस्तित्व के क्रिया के मूल में सिद्धांत के रूप में पहचाना गया पर संघर्ष करके मानव कहां पहुंचा है यह हम सबको विदित हीहै।

हर मानव परस्पर अविश्वास ,दुविधा, द्वंद का शिकार है और प्रकृति में असंतुलन है कुल मिलाकर मानव जाति ने जो भी प्रयास किए उनसे समस्या ही उत्पन्न हुई समस्या का ही वितरण हुआ जबकि खोज समाधान की थी ।

अतः आदर्शवादी विचारधारा ने कहा कि चेतना से पदार्थ पैदा होता है भौतिकवादी विचार ने कहा कि पदार्थ से चेतना पैदा होती है पर वर्तमान तक यह दोनों बातें सिद्ध नहीं हो पाई है।

मानव ने इन दोनों विचारों के आधार पर जीकर देखा, पर आज भी मानव मानव के साथ अविश्वास पूर्वक जी रहा है ।
स्वयं दुविधा द्वंद का शिकार है परिवार समाज जैसी संरचनाएं विघटन के कगार पर है प्राकृतिक असंतुलन के कारण मानव जाति के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह है।

इन सब समस्याओं के बीच जब हम शांति और सद्भाव जैसे मानव की आदिम कालीन इच्छाओं को सार्थक स्वरूप देने की ब की कामना से इकट्ठे हुए हैं। तब इन सभी परिप्रेक्ष्य में विचार करने की आवश्यकता है।

मानव जाति आदिकाल से सुख, शांति पूर्वक जीना चाहती है मानव की यह चाहत कैसे पूरी होगी इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है ।
मानव जब अध्ययन करता है तो यह पाता है कि , प्रकृति है जिसमें पदार्थ अवस्था,प्राण अवस्था, जीव अवस्था यह तीनों अवस्थाएं मानव की पूरक होती है ,एक दूसरे की भी पूरक होती है .इसी कारण प्राकृतिक व्यवस्था बनी हुई है। इन तीनों अवस्थाओं में जो भी असंतुलन उत्पन्न हुआ वह मानव के हस्तक्षेप का ही परिणाम है।

मानव के अलावा अस्तित्व में हर इकाई का आचरण निश्चित है। मानव, मिट्टी, पत्थर ,पेड़-पौधे जीव जानवरों के आचरण पर तो भरोसा करता है ,पर स्वयं के आचरण पर विश्वास नहीं कर पाता है. यह भी विचारणीय प्रश्न है ?

पर वर्तमान तक मानव की जीने को जब देखने जाते हैं तब पाते हैं कि मानव भले ही जीने की निश्चित विधि प्रक्रिया को ना पहचान पाया हो लेकिन विश्वास पूर्वक ही जी पाने में सफल हुआ है, विश्वासघात होने के बावजूद भी जीना तो विश्वास के साथ ही होता है ।
भले ही मानव जाति को विश्वास की पहचान हुई हो या ना हुई हो पर जीता तो विश्वास पूर्वक ही है ।विश्वास के बगैर एक कदम चलना भी मानव के लिए संभव नहीं है ,मानव के पास जितनी भी समस्याएं हैं वह विश्वास का अभाव ही है ।
मानव का आचरण विश्वास मे हीं नियंत्रित होता है। यदि हम विश्वास के तात्विक स्थिति देखते हैं तो पाते हैं कि विश्वास खंड खंड नहीं होता विश्वास अपूर्ण भी नहीं होता विश्वास में मानव की सभी क्रिया नियंत्रित रहती है।

  • अतः मानव विश्वास पूर्वक शांति, सद्भाव के सार्थक स्वरूप में जीकर प्रमाणित हो सकता है* ।


इसके लिए मानव को प्रकृति में संतुलन व नियंत्रण के नियमों की पहचान के साथ मानव मानव के साथ जीने वाले नियमों की पहचान करनी होगी। व स्वयं में विश्वास पूर्वक कैसे जिया जा सकता है इसकी भी पहचान करनी होगी, विश्वास ही वह आधार है जो सभी मानव की जरूरत है अतः मानव विश्वास पूर्व कैसे जी सकता है यह भी समझाने की जरूरत है ।

शांति का स्वरूप युद्ध का अंत है ऐसी हम सभी की स्वीकृति है।

अभी तक मानव गलती को गलती को से युद्ध को युद्ध से अपराध को अपराध से रोकने के प्रयास में लगा हुआ है ।क्या इस प्रकार से हम शांति और सद्भाव की स्थापना कर सकते हैं यदि नहीं तो कैसे होगी इस पर विचार जो हम कर रहे हैं जिसके लिए हम इकट्ठे हुए हैं तो भेदभाव मुक्त समाज कैसे बने उस अवस्थित को हमको पहचाना होगा क्योंकि भेदभाव के रहते हुए विश्वास कभी सफल नहीं हो सकता है।

स्वतंत्रता समानता बंधुता यह तीन पुनर्जागरण कालीन उद्घोषों के मर्म को समझना होगा मानव मानव के बीच विश्वास स्थापना की विचार विधि व्यवहार विधि व कार्य विधि को भी हमें पहचानना होगा यदि शांति सद्भाव के लिए निष्ठान्वित है तो समस्या की पहचान उसके कारणों की पहचान व उसके सार्वभौमिक समाधान को पहचानना होगा क्योंकि अब विश्व आर्थिक राजनैतिक कारणों से काफी करीब आ गया है ।

यह दूरियां मिटाने के लिए मानव जाति तत्पर ही है। अतः मानव मानव के जीने के आधारों की पहचान के साथ हम शांति सद्भाव के प्रयासों को सफल कर सकते हैं। विश्वास ही व सत्ता है जिसके आधार पर पूरी मानव जाति एक हो सकती है ।


व शांति सद्भाव सफल हो सकते हैं क्योंकि यह धरती पर वर्तमान में उपस्थित सभी मानव संतानों की चाहत है।

जरूरत है तो केवल विश्वास की तात्विक,बौद्धिक और व्यावहारिक स्वरूप को पहचानने की इसका अर्थ है कि मानव जिन मूल्यों में जीना चाहता है उन मूल्यों की सार्वभौमिक पहचान के साथ परिवार व संबंधों की प्रयोजन की पहचान के साथ मानव लक्ष्य की पहचान के साथ हम सभी शांति सद्भाव की स्थापना में सफल होंगे ऐसी आशा है।

Sunita Pathak ji

Back