ब्रह्मांडों के अंग भूत इस ब्रह्मांड पर अवस्थित धरती के हम सभी मानव वन अर्थ वन एनवायरनमेंट एवं वन ग्लोबल फ्यूचर की बात कर रहे हैं ।

ऐसा इसलिए कह रहे हैं की अस्तित्व सह अस्तित्व स्वरूप है।
यह धरती सूरज को ठंडा करने का काम कर रही थी मानव ने अपने क्रियाकलापों से इस व्यवस्था में बाधा पहुंचाई जिससे अनंत ब्रह्मांड के स्तर पर जो एक इकाई की दूसरे इकाई से भागीदारी है उसमें बाधा पहुंची।?

ज्ञान सुख स्वरूप है ऐसी सूचना हमको परंपरा से मिली है यदि मानव समस्या को सूत्रित करता है तो ज्ञान का प्रमाण कैसे हैं। इस प्रश्न पर किया जा सकता है और किया जाना चाहिए

यह विचारणीय प्रश्न है




धरती पर कहीं भी व्यवधान आता है उसे व्यवधान का असर पूरी मानव जाति पर मानसिकताओं पर परिवार पर समाज पर राष्ट्र पर और अंतरराष्ट्रीय पर पड़ता है यह बात समझे जाने की महत आवश्यकता है।

प्रकृति भौतिक और रासायनिक और जीवन क्रिया के स्वरूप में है।

भौतिक क्रियाकलाप के फलन में पदार्थ अवस्था, प्राण अवस्था जीव, अवस्था के शरीर और ज्ञान अवस्था के शरीर है।

जीवन क्रियाकलाप के रूप में आशा, विचार इच्छाओं का संसार है।

मानव जितने भी प्रकार की सोच विचार करता है या मानव ने आदिकाल से आज तक अपनी समस्याओं के समाधान के जो भी प्रयास किए हैं, उसमें दो ही प्रकार के विचार वर्तमान तक विचार कार्य व्यवहार में परिलक्षित होते हैं।

एक आदर्शवादी विचार दूसरा है भौतिकवादी विचार

उनके फल परिणाम से हम सभी परिचित हैं कि वर्तमान तक मानव की जीने का स्वरूप परिवार में आदर्शवादी विधि से है।
पूरी धरती पर और व्यवस्थाओं में भौतिकवादी विधियां है जैसे न्याय व्यवस्था राज्य व्यवस्था शिक्षा व्यवस्था आदि

मानव ने अपनी मानसिकता के आधार पर भोग मानसिकता के कारण से प्रकृति का दोहन किया और सुविधा संग्रह के अनंत चक्कर में फस गया तृप्ति का बिंदु नहीं मिला

  • मानव मुक्ति नहीं तृप्ति चाहता है*


आदर्शवाद ने मुक्ति का कार्यक्रम दिया वह आज तक सफल नहीं हुआ।


मानव जाति आदर्शवाद के आधार पर रहस्य में फंस गई और भौतिकवाद के आधार पर संग्रह सुविधा में

वैचारिक अस्पष्टता ही मानव में भय का कारण है


इसलिए आदर्शवाद में मानव भय से मुक्ति के लिए कबीला युग से जो यात्रा की उसने , उसमें उसने प्राकृतिक भय और पासविक भय में तो सफल हुआ दिखाई पड़ता है।
मानव में निहित मानवीयता का भय था, उससे आज भी मुक्त नहीं हो पाया है।

यदि इसका हम जिम्मेदारी के साथ विश्लेषण करें तो पाते हैं
अस्तित्व सह अस्तित्व के रूप में अविभाज्य है।

तो हम वननेस को पहचान सकते हैं।

जैसे हर इकाई नियम पूर्वक है सभी भौतिक क्रियाकलाप नियम पूर्वक हैं ,नियम में जीने की हर मानव को स्वीकृति है पर मानव के अपने जीने के नियमों की स्पष्ट पहचान अभी तक नहीं हुई इसलिए हम वन अर्थ वन ग्लोबल फ्यूचर की बात कर रहे हैं।

क्योंकि अभी तक जो भी मानव परंपरा में उत्पादन कार्य व्यवहार कार्य व्यवस्था कार्य हुआ है उससे समस्या ही सूत्रित हुई है।

इसके समाधान खोज जाने हैं तो प्रकृति के अविभाज्यता को पहचानना होगा

पदार्थ ही जब रासायनिक जल में भीग रहता है तब उसमें किसी निश्चित ताप दाब में प्राण कोष में श्वसन प्रश्वसन शुरू होता है।

प्राणावस्था की रचनाएं अस्तित्व में आती है।

प्राणावस्था के अवशेषों से ही स्वेदज,अंडज, पिडंज संसार की रचनाएं रहती हैं।

जीव शरीर और मानव शरीर प्राण अवस्था की ही रचना है।

तो यह अविभाज्यता हमको दिखाई देती है की पदार्थ अवस्था ही प्राण अवस्था के रूप में,प्राण अवस्था ही जीव अवस्था जीव शरीरों से ही ज्ञान अवस्था के शरीरों का प्रकटन है।

इसको हम ऐसे भी समझ सकते हैं कीभौतिक शास्त्र ही रसायन शास्त्र, रसायन शास्त्र ही वनस्पति शास्त्र , वनस्पति शास्त्र ही यह जीव शास्त्र के रूप में है


फिर मानव परंपरा में जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में

शरीर के पोषण के लिए उत्पादन कार्य और जीवन के पोषण के लिए शिक्षण कार्य है

शिक्षा का उद्देश्य शिष्टता पूर्ण द्रष्टि का उदय है।

शिष्टताता पूर्ण दृष्टि का अर्थ है नियंत्रण संतुलन को प्रस्तुत करना।

क्योंकि मनवेतर प्रकृति में नियंत्रण संतुलन को व्यक्त है ।

मानव अपने वैचारिक नियंत्रण को व्यक्त नहीं कर पाया, इसलिए व्यावहारिक और व्यावसायिक नियंत्रण को भी व्यक्त नहीं कर पाया ,

यह बात आसानी से समझ में आती है।

यह जो चारों अवस्थाओं की अविभाज्यता है और इन चारों अवस्थाओं की अविभाज्यता के साथ धरती की सोलर सिस्टम के साथ जो अविभाज्यता है।

इसको पहचानते हैं तो वन अर्थ वन एनवायरनमेंट जो प्राकृतिक और मानव कृत वातावरण है उसकी सार्वभौमिकता को पहचाने जाने की आवश्यकता है जिससे ही मानव समाधान से सूत्रत हो सकेगा।

व वर्तमान में मानव की सभी समस्याओं के सार्वभौमिक समाधान उपलब्ध हो सकेंगे सह-अस्तित्व वादी विचार को समझे जाने की आवश्यकता है।

जो भौतिकवाद और आदर्शवाद से उपजी समस्याओं के सर्वतो मुखी समाधान या यूं कहें की सार्वभौमिक समाधान को प्रस्तुत करता है।

Vidhi ji

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