• आज श्री शब्द की व्याख्या पर ध्यान गया*



तो यह भी ध्यान गया कि हमारे यहां परंपरा में पति-पत्नी को श्रीमान और श्रीमती के संबोधन से संबोधित किया गया है।

श्री का अर्थ होता है विवेक विज्ञान संपन्नता

अर्थात समाधान के प्रकाश में समृद्धि की स्पष्टता।



किंतु जब इसको संबंधों की परिप्रेक्ष्य में परंपरा में जिस प्रकार से व्याख्याित है, तब पता चला या ध्यान गया कि जब तक मानव संकीर्ण मानसिकताओं में है तब तक विशाल अर्थों को संकीर्णता में ही ग्रहण कर पाते हैं।


इसीलिए पुरुषों ने स्वयं श्रेष्ठता के अभियान वश स्वयं को स्त्रियों के श्री का अधिकारी मान लिया और मानसिकताओं से लेकर परिवार व्यवस्था से लेकर के पूजा परंपराओं और रीति रिवाज में स्वयं को स्त्री की स्त्री का स्रोत मान लिया।

स्त्रियों में भी कुछ इसी प्रकार की स्वीकृति हो गई क्योंकि परंपरा में जैसी व्याख्याएं रहती हैं उनके साथ ही जीने का स्वरूप रहता है संकीर्णता में विवशताएं रहती ही हैं।

विशाल अर्थ की स्पष्टता के अभाव में संकीर्णता में जीना होता है अतः स्त्रियों ने भी श्रीमती के अर्थ को नहीं पहचान पाया।



आज जब श्री शब्द को मैंने समझा और जाना तब इस श्री जो चित्त की क्रिया है।

संतोष के साथ अर्थात अभाव का अभाव हो जाए तो मानव में जो ज्ञान संपन्नता का अभाव रहा है; इस कारण मानव सीमित अर्थों में सभी वास्तविकताओं को देख पाया

इस प्रकार से श्री को भी पद के रूप में धन के रूप में बाहुबल के रूप में देखा और वैसे ही परिणतियां समाज में रही ।

लेकिन मानव का सम्मान गरिमा श्री के अर्थ में है।

वह है विवेक संपन्नता और विवेक संपन्नता के साथ संबंधों का प्रयोजन के अर्थ में पहचान और प्रायोजन के अर्थ में जीना हर नर नारी का मानव का अधिकार है।



*इस प्रकार से जब मानव चेतना की सार्वभौम व्याख्या के साथ श्री व श्रीमती शब्द को पहचानने में जाते हैं तो यह पाते हैं कि हर मानव श्री संपन्न है*

और हर मानव अपनेआचरण पूर्वक विवेक विज्ञान संपन्नता को अर्थात समाधान समृद्धि में भागीदारी पूर्वक मानव गरिमा की स्थापना करके संबंधों की गरिमा के भी स्थापना करेगा।


और श्रीमान और श्रीमती शब्द का मूल अर्थ प्रमाणित होगा।


लेखिका सुनीता पाठक

Sunita Pathak ji

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