देहरी के पार पत्रिका के लिए लेख लिखते समय मनन चल रहा था कि आखिरकार देहरी के भीतर की दुनिया मानव के जीने की जगह होने के बावजूद भी टूटन के कगार पर क्यों है।
तो उत्तर आता है कि यह मानव जाति के वैचारिक इतिहास को देखें तो पता चलेगा कि अस्तित्व के संदर्भ में मानव ने जितना भी सोच पाया वह इस प्रकार है।
पहले मानव ने जंगल युग में प्रवेश किया तो प्राकृतिक भय व पाशविकता के भय से मुक्त होना प्राथमिकता थी।
अतः पशुओं से व मानव में निहित अमानवीयता के भय से मुक्ति दिलाने वाले बाहुबलियों को शारीरिक बल संपन्नता के आधार पर श्रेष्ठ के रूप में पहचाना व उनके अधीन रहना प्रारंभ किया इस प्रकार से राज्य गद्दी का आरंभ हुआ।
इसी प्रकार प्रकृति के रहस्य को समझने की जिम्मेदारी जिन मानव संतानों ने ली उनकी भी श्रेष्ठता को मानव जाती ने स्वीकार किया व इस प्रकार से धर्म गद्दियों की स्थापना हुई।
इसी प्रकार शिला युग ,धातु युग के चलते हुए मानव जाति ने जंगल व पत्थर व धातुओं को व अन्य आवश्यक वस्तुओं को धन माना।
इस प्रकार की वस्तुओं का संग्रह जिनके पास रहा उनको श्रेष्ठ के रूप में स्वीकारा
कबीला युग ग्राम युग आते तक मानव ने नस्ल,रंग के आधार पर एक दूसरे को विरोधी मानकर संघर्ष व युद्ध कर लिया व एक दूसरे से भयभीत होते रहे यह भय वर्तमान तक सूत्रित है।
इसके साथ ही दास युग में ईश्वर राजा और गुरु के प्रति नतमस्तक होने की बात भी रही, इस प्रकार राजा से प्रजा को सुरक्षा का सुखचैन का आश्वासन रहा
वह धर्म ग व दर्शनों में एवं विचारों के आधार पर पाप अज्ञान व स्वार्थ से मुक्त होने के आश्वासन के आधार पर दास युग को मानव जाति ने विकल्प के अभाव में स्वीकारा
आदर्शवादी विचार के प्रति उत्तर में भौतिकवाद प्रतिपादित हुआ
और जहां आदर्शवाद में शास्त्र प्रमाण की बात की गई वैसे ही भौतिकवाद में यंत्र प्रमाण की बात की गई
इस प्रकार संघर्ष युग का लोक व्यापीकरण होना सुगम हो गया
क्योंकि भौतिक वाद व आदर्शवाद में तकनीकी विकास से व सत्य की स्पष्टता के अभाव में व्यक्ति -व्यक्ति के मध्य वैचारिक अंतर्द्वंद के कारण से संघर्ष रहा
क्योंकि इन दोनों विचारों से सत्य स्पष्ट नहीं हुआ।
मानव मानव के बीच जो वैचारिक अस्पष्टता थी वह संग्रह सुविधा के भौतिकवादी आकर्षण व भोगोन्माद ,लाभोन्माद व कामोन्माद की भेंट चढ़ गया
इस प्रकार वैचारिक स्पष्टता ना तो स्त्रियों में रही ना पुरुषों में रही।
आदर्शवाद में परिवार व संबंधों की बातें थी, पर अंतिम लक्ष्य मोक्ष होने के कारण संबंधों को माया कहा गया, व परिवार की उपेक्षा हुई पर त्याग की बात सामान्य जनमानस में स्वीकार रही वह मोक्ष को अंतिम लक्ष्य मानकर मानवीय शक्तियां मोक्ष के लिए अर्पित हुई पर इतनी महत्वपूर्ण लक्ष्य और मानव के अथक प्रयासों का फल अव्यक्त व अनिवार्चनीय कह कर मानव परंपरा में वितरित नहीं हो पाया।
इसी प्रकार आदर्शवाद में जहां त्याग की बात थी वही भौतिकवाद में भोगों को प्रोत्साहित किया गया जिसमें मानव -मानव के बीच संबंधों की गरिमा व मर्यादा की जो रूढ़िवादी मान्यताएं कम से कम आहार ,निद्रा भय, मैथुन के मानवीय शरीर मूलक क्रियाकलाप को मर्यादित की हुई थी।
वहीं भौतिकवाद के प्रणयन के साथ संबंधों में स्थापित रूढ़िवादी मान्यताओं की मर्यादाएं भी भोग प्रव्रत्ति में ढह गई हम सब वर्तमान में व्यक्तिगत ,पारिवारिक, सामाजिक ,व पारिवारिक व्यवस्था के विघटन के साक्षी है।
मानव आदिम युग में जैसे स्त्री पुरुष होकर जी रहा था उसी जगह भोगोन्माद , कामोन्माद,लाभोन्माद में फंसकर वापस आदिम युग में पहुंचने की स्थिति में मानव जाति है इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
इन वे विसंगतियों के उत्तर ना तो बुद्धिजीवियों के पास है ना ही धर्म संस्थाओं के पास है ना ही राज्य गद्दियों के पास है ना ही व्यापार गद्दी के पास है।
कल्पना व अनुमानों के आधार पर सत्य व सत्यता का विश्लेषण करने वाली बुद्धिजीवी; सुख, शांति ,संतोष आनंदपूर्वक जीने की चाहना की सार्वभौमिक व्याख्या नहीं कर पाए।
धर्म संस्थाएं परस्पर विरोध से ग्रस्त हैं उन्होंने पापी को पुण्यात्मा व अज्ञानी को ज्ञानी बनाने का जो आश्वासन दिया था जिस आश्वासन पर मानव जाती इन गद्दियों के प्रति अर्पित, समर्पित रही वे पाप पुण्य को परिभाषित व व्याख्यायित नहीं कर पाई
इसलिए पापी को पुण्यात्मा नहीं बना पाई ज्ञान अर्थात विवेक स्पष्ट नहीं हुआ व विज्ञान की दिशा स्पष्ट नहीं हो पाई।
राजगद्दियों ने जो सुख, शांति पूर्वक जीने के आश्वासन व सुरक्षा, संरक्षण के आश्वासन दिए थे वह भी पूरा नहीं हो पाया।
व्यापार गद्दु संग्रह से युक्त है जहां शोषण है वहां संबंध नहीं केवल संबोधन है।
“संबंधों में भाव पक्ष का तिरस्कार ही शोषण है”1
- उपरोक्त संदर्भ मध्यस्थ दर्शन से अस्तित्व वाद से है*
प्रणेता श्री ए नागराज
शिक्षा गद्दु मानव की अपेक्षाओं को इन्हीं दो विचारों के आधार पर कार्यरत दिखाई पड़ती है
सुख ,शांति ,संतोष ,आनंद से जीने की आदिकालीन मानव चाहनाओं का भक्ति विरक्ति की आदर्शवादी प्रक्रिया व संग्रह सुविधा की भौतिकवादी प्रक्रियाओं से पूरे करने के प्रयास जो मानव परंपरा में हुए समस्त शिक्षा गद्दी इस प्रकार की दोनों विचारधाराओं में क्रमशः समर्पित रही।
आदर्शवाद में जीने की स्थली व लक्ष्य परिवार नहीं था क्योंकि भक्ति विरक्ति विधि से परिवारों में संबंध निर्वाह नहीं हो सकता है।
व भक्ति विरक्ति लक्ष्य होने से परिवार में जीना मानव का लक्ष्य नहीं रहा स्त्रियों में भी नहीं रहा पुरुषों में भी नहीं रहा
पर समाज में परिवार से बाहर जाकर साधना करने की स्वतंत्रता पुरुषों को रही स्त्रियों को नहीं रही क्योंकि स्त्रियों के लिए सुरक्षित वातावरण ना तो आदर्शवादी युग में था ना ही भौतिकवादी युग में है यदि किसी को सुरक्षा दिखती है तो पुनर्विचार की आवश्यकता है।
मां बनने के कारण स्त्रियों ने इन अवसरों पर ध्यान ही नहीं दिया यह एक अनुमान बनता है व परिवार के अंदर रहकर ही संबंधों के निर्वाह की परंपरा को स्त्रियों ने मां, बहन ,पत्नी माता के रूप में निभाया इतिहास इस बात का गवाह है।
स्त्रियों में मां बनने के कारण से अपनेपन की पहचान होती कारण होती है
जिस कारण हर संबंध में अपनापन वितरित होता है पर स्त्रियों को भी संबंध की पहचान तो है पर संबंधों का प्रयोजन स्पष्ट नहीं रहा है यह विसंगति परंपरा में रही है
सुख ,शांति के स्रोत स्पष्ट नहीं है, शासन को व्यवस्था मानने की भूल स्त्रियों से भी हुई है यदि स्त्रियों में वैचारिक स्पष्टता होती तो वह अपने संतानों में उसे स्पष्टता को संप्रेषित कर पाती पर यह कमी स्त्रियों में भी रही।
वैचारिक स्पष्टता का अभाव स्त्री पुरुष दोनों में ही रहा इसलिए अभिभावकत्व सफल नहीं हो पाया।
मानव परंपरा में जो विचार हुआ आदर्शवादी व भौतिकवादी विचार एक का कहना था कि चेतना से पदार्थ पैदा होती है और एक कहना है की पदार्थ से चेतना पैदा होती है आज तक किसी ने चेतना से पदार्थ को पैदा होते नहीं देखा और किसी ने पदार्थ से चेतनख को पैदा होते नहीं देखा है।
जड़ चैतन्य व चेतना जैसे शब्दों के अर्थों का सर्वकालिक समाधानित अर्थों को व अस्तित्व के प्रारंभ को पहचानने के प्रयास अवश्य हुए हैं।
पर आज तक अस्तित्व की उत्पत्ति के संदर्भ में किसी निश्चित निष्कर्ष तक मानव जाति नहीं पहुंच पाई है।
व जड़, चैतन्य व चेतना जैसे शब्द व ध्वनियों से तो परिचित है पर सार्वभौमिक अर्थो से नहीं।
हर मानव में वैचारिक क्षमता समान है इसको सामान्य निरीक्षण परीक्षण से समझा जा सकता है।
इस आधार पर समानता के ध्रुव बिंदुओं को पहचाना जा सकता है
मेरा आग्रह सिर्फ यही है कि जिन वैचारिक अस्पष्टताओं के मध्य मानव जाति (स्त्री -पुरुष) जी रही है उनके चलते स्त्री पुरुष समानता व देहरी के भीतर की दुनिया की जो रचना हुई उससे बाहर की दुनिया में वैचारिक द्वंद्व नस्ल रंग ,जाति भाषा ,मत ,पंथ ,संप्रदाय ,पद धन व विचार से संबंधित जो भेदभाव कारी वातावरण निर्मित हुआ उन सबके बीच सुख ,शांति ,संतोष की चाहना और समानता की चाहना रखने वाले सभी आशावादियों को मेरा अभिवादन।
निष्कर्ष रूप में यही कहना चाहती हूं कि ,जब तक मानव जाती अस्तित्व की उत्पत्ति के संदर्भ में निर्भ्रांत नहीं होगा तब तक मानव रूप में स्वयं को सार्वभौमिकता में नहीं पहचानेगी मानवीय आचरण को सार्वभौमिकता में नहीं पहचानेगी तब तक वैचारिक अंतर्द्वंद से मुक्त नहीं होगी।
व्यवस्था के सह अस्तित्व वादी स्वरूप को नहीं पहचानेगी तब तक सभी अपेक्षाएं कल्पना में ही रहेंगे सुख ,शांति ,न्याय में जीने की अपेक्षा ही रहेगी वास्तविक धरातल पर न्याय प्रमाणित नहीं हो पाएगा
समानता की आशा भी सुख शांति से जीने की अपेक्षा का स्वरूप ही है यह इस बात को समझना होगा।
स्त्री व पुरुष दोनों अन्याय पूर्ण स्थितियों में जी रहे हैं।
स्त्रियों की स्थिति पारिवारिक सामाजिक रूप से ज्यादा दयनीय है यह तो स्वीकार करना ही होगा।
जिस विचार को स्वतंत्रता से व्यक्त करने, निर्णय करने का अधिकार नहीं है जिसको अपने देह पर अधिकार नहीं अपने श्रम पर अधिकार नहीं उसकी अवस्थित का अंदाजा हम सभी लगा सकते हैं।
स्त्री प्रश्न भी मानव जाति में न्याय की अनुपस्थिति का प्रश्न है इस रूप में भी स्त्री प्रश्नों को स्वीकारना पड़ेगा
लेखिका सुनीता पाठक
उपरोक्त लेख का आधार *(मध्यस्थ दर्शन सह अस्तित्व बाद है जिसके प्रणेता श्री ए नागराज जी है)*