औरतें बहुत बोलती हैं आज इस आदिकालीन मान्यता पर ध्यान गया
गर्भ के समय से ही बच्चा सुनता है ऐसी मान्यता हमारे भारतीय जन मानस में स्वीकृत हैं
गर्भ के समय से लड़का होगा ऐसी ध्वनि के साथ गर्भस्थ कन्या शिशु गर्भ में विकसित होता है
आप सोचिये सार्वभौमिक मानव मानसिकता के अभाव में मानव संतानों के साथ किस प्रकार से परिवार में संभाषण होता है।इसके दूरगामी परिणाम स्त्री शरीर में जन्में शिशु में व पुरुष शरीर में जन्में शिशु में कैसे जन्म के पहले से ही श्रेष्ठता व नेष्ठता को मानसिकता में आरोपित करता है।
स्त्रियों को यह बोलना चाहिए स्त्रियों को वह बोलना चाहिए ऐसे नहीं बोलना चाहिए वैसे नहीं बोलना चाहिए स्त्रियों बहुत बोलती हैं अनेक प्रकार के आरोप स्त्रियों पर लगते हैं।
पुरुषों को इस तरीके की किसी भी प्रकार के आरोपों से संबोधित नहीं किया जाता है
पुरुष सभी प्रकार के अधिकारों से संपन्न ही जन्म लेते हैं समस्त प्रकार की स्त्रियां गलती करती है और उन्हें ही सुधारने की जरूरत है
परिवार परंपरा में स्त्रियां ही बिगड़ गई है और उन्हें ही सुधारना है ऐसा अमूमन सुनने को देखने को मिलता हैं
मानव चेतना के संदर्भ में इन सभी मान्यताओं को पहचाने जाने की महत् आवश्यकता है।
विवाह के बाद अपनी दुख तकलीफों को ना तो अपने माता-पिता से कह पाते हैं ना ही ससुराल पक्ष को जब भी कभी उन्हें अभिव्यक्त होने का मौका मिलता है तो जिस व्यग्रता के साथ महिलाएं व्यक्त होती हैं।
उसे बहुत बोलने कहकर अपमानित किया जाता है एक बार मानवीय दृष्टि से स्त्री की स्थिति को मार्मिकता के साथ पहचानने की जरूरत है।
स्त्रियां भी इसे अपनी कमी मानकर स्वीकार कर लेती है उन्हें अपने दुख को दुख भी महसूस नहीं कराया जाता अपमान को अपमान भी मानना महसूस नहीं कराया जाता ये कैसी मानवीय परंपरा है यह कैसी प्रथम शिक्षिका है।
प्रथम शिक्षिका देवी जैसे उपाधियों से विभूषित करके भ्रमित करने का जो कार्यक्रम मानव परंपरा में किया गया और महिलाएं जो भ्रमित हुई वह सभी मानव परंपरा के पतन के लिए जिम्मेदार है।
भेदभाव मानसिकताओं के साथ संबंध में विश्वास की स्थापना संभव है क्या यह विचारणीय मुद्दा है
मानव जाति की सभी समस्याओं का कारण सार्वभौमिक मानव मानसिकता की पहचान मानव विचार परंपरा में न हो पाने है।
मानव जाति में अभी तक आदर्शवादी व भौतिकवादी विचार धारा के आधार पर जो चिंतन हुआ वह मानव चेतना के सार्वभौमिक स्वरूप को व्यक्त नहीं कर पाया इस कारण मानव जाति आदर्शवादी विचार के आधार पर सामुदायिक चेतना में जीने को विवश हुआ व भौतिकवादी विचार के आधार पर वर्गीय चेतना में जीने को विवश हुआ
मानव जाति सभी प्रकार की विवशताओं से मुक्त होकर जीना चाहती है पर न्याय, धर्म, सत्य की सार्वभौमिक व्याख्या न हो पाने के कारण मानव जाति विवशता व दास्तां में जीने के लिए विवश हुई
मानव ज्ञानावस्था की इकाई है अतः ज्ञानपूर्वक ही वह सभी प्रकार की दास्तां व विवशता से मुक्त हो सकती है स्त्रीत्व व पुरुषत्व जैसी मान्यता में मानव चेतना के सार्वभौमिक चिंतन व चित्रण के अभाव का परिणाम है मानव चेतना में हर नर नारी समझ में समानता को पहचान कर मानवत्व में जीकर संबंधों को प्रयोजन के अर्थ में जीकर अपने को सार्थक कर सकते हैं।
स्त्रियां मानवत्व में जीकर प्रथम शिक्षिका होने के संबोधन को प्रमाणित कर मानवीय परिवार परंपरा को प्रमाणित करने में समर्थ हो सकेंगे व अपने शिशुओं को शारीरिक पोषण के साथ संस्कृति,(विचार पक्ष ) सभ्यता (व्यवहार पक्ष का पोषण) विधि(सह अस्तित्व) व्यवस्था (नियम पूर्ण उत्पादन) करके संस्कृति सभ्यता विधि व्यवस्था अर्थात मानवीय परंपरा का पोषण कर सकते में समर्थ होकर स्वयं के जीवन को और अपने शिशुओं के जीवन को सार्थकता दे सकते में सफल होंगे।
सभी स्त्री प्रश्न न्याय की अनुपस्थिति के प्रश्न है इन्हें स्त्री प्रश्नों के रूप में ना पहचान कर मानव जाति की समस्या के रूप में ना पहचान पाना भी भेदभाव कारी मानसिकता का परिचायक है।
सभी स्त्री प्रश्न मानव जाति के प्रश्न है बहन ,बेटियों और पत्नियों के प्रश्न है ।
क्या स्त्री होना एक अलग बात है और बहन बेटी होना अलग बात है इस पर भी गंभीरता से
विचार करने की आवश्यकता है।
लेखिका सुनीता पाठक