निबंध -
संयुक्त मानवजाति के लिए युद्ध एक अनावश्यक घटना

रूपरेखा -

प्रस्तावना
युद्ध के कारण -
a. आर्थिक कारण
b. सामाजिक कारण
c. धार्मिक कारण
d. राजनीतिक कारण
e. क्षेत्रीय कारण
f. साम्राज्यवाद, सैन्यवाद, विचारों में मतभेद
युद्ध के परिणाम -
a. मानवजाति पर प्रभाव
b. मानव अधिकारों का उल्लंघन
c. आर्थिक प्रभाव
d. प्रकृति, जीव-जन्तु एवं वनस्पति पर प्रभाव
युद्ध को रोकने के उपाय
उपसंहार

1. प्रस्तावना -
‘युद्ध’ शब्द स्वयं में विनाश का द्योतक है। जब मानव, समझ न होने के कारण, मानवता को भूलकर अपने निजी फायदे के लिए अन्य मानव के साथ न्याय नहीं करता है, तब दो पक्षों के बीच मतभेद होता है और युद्ध प्रारंभ होता है। यह युद्ध पहले शीत युद्ध (बातचीत एवं वक्तव्यों) के रूप में शुरू होता है और बाद में हथियारों के साथ लड़ा जाता है। किसी भी परिस्थिति में युद्ध मानव प्रजाति के लिए हमेशा विनाशकारी ही रहा है। मानव ने इसके कई भयंकर परिणामों का सामना भी किया है।

2. युद्ध के कारण -
युद्ध होने के कई कारण हैं:

a. आर्थिक कारण -
ज्यादातर युद्ध आर्थिक परिप्रेक्ष्य में ही लड़े गए हैं। यदि किसी स्थान पर साधनों एवं धन की कमी होती है, तो वहाँ के लोग अन्य साधन-सम्पन्न स्थानों से उसकी पूर्ति करने का प्रयत्न करते हैं। यह प्रयत्न बातचीत या सहयोग से पूरा न होने पर बलपूर्वक कब्जा कर अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का प्रयास करते हैं।

आधुनिक युग में प्रत्येक देश अपने आप को सशक्त बनाने के लिए आर्थिक क्षेत्र में बलवान बनना चाहता है, जिसके लिए वे अन्य देशों की आर्थिक दशा का लाभ उठाते हैं। अपने उत्पादित सामान द्वारा वहाँ की आर्थिक व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास करते हैं, जिससे दोनों देशों के बीच मतभेद उत्पन्न होते हैं और युद्ध जैसी परिस्थितियां बनती हैं।

वर्तमान में, विकसित माने जाने वाले देशों के आर्थिक विकास का आधार हथियारों का निर्माण करना है। वे इनकी बिक्री के लिए अन्य देशों में आर्थिक एवं राजनीतिक हस्तक्षेप कर युद्ध करवाते हैं, और दोनों पक्षों को हथियार बेचकर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करते हैं।

b. सामाजिक कारण -
कई देशों में समाज दो वर्गों में बंटा है—एक पूंजीपतियों का और दूसरा मजदूरों का। मजदूरों का जीवन हमेशा कष्टमय रहा है, जिससे उनमें असंतोष व आक्रोश की भावना जाग्रत होती है और देश में शीत युद्ध प्रारंभ हो जाता है, जो कभी-कभी हथियारों के साथ भी लड़ा जाता है। ऐसी स्थिति में साम्राज्यवाद और साम्यवाद जैसी विचारधाराएं प्रभावी हो जाती हैं। इस स्थिति में कार्ल मार्क्स और हिटलर जैसे विचारकों के सिद्धांतों का प्रभाव लोगों पर पड़ता है और युद्ध प्रारंभ हो जाता है।

c. धार्मिक कारण -
मानव प्रजाति कई धर्मों को अपनाती है। कई लोग केवल अपनी मान्यता के आधार पर अपने धर्म को श्रेष्ठ मानते हैं और दूसरों की अवहेलना कर अपने धर्म का प्रचार बलपूर्वक करने लगते हैं। यदि उनके धर्म को न माना जाए, तो वे अत्याचार करने लगते हैं, जिससे वैमनस्यता बढ़ती है और युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न होती है। नाजीवाद और फासीवाद इसके उदाहरण हैं।

d. राजनीतिक कारण -
स्वार्थी नेता अपने निजी हितों के लिए गलत नीतियां अपनाते हैं। ऐसी राजनीति का आमजन से कोई सरोकार नहीं होता। इन स्वार्थी नीतियों के कारण जनआक्रोश पनपता है, जिसका लाभ अन्य देश उठाते हैं और आक्रमण करते हैं। मुखिया की नासमझी और गलत नीतियां युद्ध को जन्म देती हैं।

e. क्षेत्रीय कारण -
मानव ने संपूर्ण पृथ्वी को अलग-अलग क्षेत्रों में बांटकर संयुक्त राष्ट्रों को कई देशों के रूप में विभाजित किया है। प्रत्येक क्षेत्र की रक्षा हेतु नियम-कानून बनाए गए हैं। यदि कोई देश इन नियमों का उल्लंघन कर, किसी अन्य क्षेत्र की सीमा में अवांछनीय गतिविधियां करता है, तो दोनों देशों के बीच मतभेद बढ़ते हैं और युद्ध में बदल जाते हैं। भारत-पाकिस्तान के युद्ध इसके उदाहरण हैं।

f. साम्राज्यवाद, सैन्यवाद एवं विचारों में मतभेद -
कई बार शासक अपने देश की सीमाएं बढ़ाने की महत्वाकांक्षा रखते हैं, जिससे वे पड़ोसी देशों से शत्रुता कर सीमा विस्तार के लिए युद्ध छेड़ देते हैं, जैसे चीन।
कुछ देशों में सैन्य शासन होता है, और वे हमेशा युद्धवादी मानसिकता के साथ शासन करते हैं।
कई बार लोगों के बीच वैचारिक मतभेद भी युद्ध का कारण बनते हैं।

3. युद्ध के परिणाम -
युद्ध के परिणाम सदैव घातक सिद्ध हुए हैं, जिनका प्रभाव संपूर्ण मानव प्रजाति पर पड़ा है:

a. मानवजाति पर प्रभाव -
युद्ध का मूल कारण भी मानव है, और उसके दुष्परिणाम भी मानव को ही भुगतने पड़ते हैं। लोगों के घर उजड़ जाते हैं, प्रियजन मारे जाते हैं, सैनिकों को प्राण त्यागने पड़ते हैं, और उनके परिवार असहाय हो जाते हैं। युद्ध के दौरान अमानवीय यातनाएं सहनी पड़ती हैं। जन-धन की अपार हानि होती है।

b. मानव अधिकारों का उल्लंघन -
युद्ध में मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन होता है। पराजित देश के नागरिकों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है। भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा, शारीरिक अत्याचार, मानसिक यातनाएं और बीमारियां बढ़ जाती हैं।

c. आर्थिक प्रभाव -
युद्ध में दोनों पक्ष अपने सभी आर्थिक संसाधन झोंक देते हैं और युद्ध के बाद आर्थिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। इसका खामियाजा साधारण जनता को भुगतना पड़ता है, जिससे विकास रुक जाता है और निम्न जीवन स्तर में गुजारा करना पड़ता है।

d. प्रकृति, जीव-जन्तु एवं वनस्पति पर प्रभाव -
महाभारत युद्ध से लेकर हिरोशिमा-नागासाकी तक, हर युद्ध ने प्राकृतिक सुंदरता को नष्ट किया है। जल, वायु और भूमि प्रदूषित होते हैं, जीव-जंतु विलुप्त होते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है। एक युद्ध का असर कई पीढ़ियों तक रहता है।

4. युद्ध को रोकने के उपाय -
a. ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को अपनाना होगा, जिससे पूरी पृथ्वी एक परिवार के रूप में देखी जा सके।
b. मानव को मानवीय गुणों की समझ करानी होगी, ताकि वह पूरकता में जी सके।
c. संसाधनों का समान वितरण सुनिश्चित करना होगा।
d. क्षेत्रीय विवादों की जगह सह-अस्तित्व की भावना अपनानी होगी।
e. वस्तु की बजाय भाव को प्राथमिकता देनी होगी।
f. उत्पादन और उपभोग को संतुलित करना होगा।
g. मतभेदों को संवाद और समझदारी से हल करना होगा।
h. पृथ्वी को माता और स्वयं को पुत्र समझकर उसके संरक्षण का संकल्प लेना होगा।
i. धर्म से पहले मानवता को स्थान देना होगा।

निष्कर्ष -
युद्ध सदा विनाशकारी रहा है। यदि मानव, मानवता और पृथ्वी के अस्तित्व का सही अर्थ समझ ले, तो युद्ध जैसी स्थिति कभी उत्पन्न ही नहीं होगी। सहयोग और सह-अस्तित्व की भावना के साथ जीवन जिएं, तो युद्ध की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।
इस प्रकार, युद्ध संयुक्त मानवजाति के लिए हमेशा एक अवांछनीय घटना ही रहेगा।
Chandrakiran Bopche
Prerna Vidyalaya,Bemetra ,Chattisgarh

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