निबंध: युद्ध अखंड मानव समाज हेतु एक अनावश्यक कार्यक्रम
एक मानव के अंदर सुख की चाहत होती है और उस चाहत को पूरी करने के लिए मानव के सारे प्रयास होते हैं। अब देखें तो शरीर के कार्यक्रम सभी मानवों के समान हैं। इसलिए शरीर से संबंधित जितने भी विचार हैं, उनमें कोई मतभेद नहीं है। मतभेद है तो बस उन विचारों में जो सुख के लिए हैं। एक मानव दूसरे मानव के साथ सुखी रहना चाहता है और जब देखा गया कि सुखी वह तभी महसूस करता है जब उन दोनों के आपस में विचार मिलते हैं। यदि विचार नहीं मिलते और भौतिक-रासायनिक वस्तुओं का अंबार लगा है, तो भी वह अपने आप को आराम में नहीं पाता है। ऐसी स्थिति में जिनके साथ विचार मिलते हैं, उनके लिए एक अलग भावना और जिनके साथ विचार नहीं मिलते उनके लिए एक अलग भावना पैदा होती है। इसलिए एक वैचारिक संबंध स्थापित होता है और एक पारिवारिक संबंध होता है जिसे रक्त संबंध (blood relation) कहते हैं।
पारिवारिक संबंध होने के बावजूद यदि वहां वैचारिक संबंध नहीं है तो एक परिवार में रहते हुए भी मानव एक-दूसरे के साथ संघर्ष करते दिखते हैं। भय से ग्रसित रहते हैं, क्लेश में लिप्त रहते हैं। इसलिए मानव जाति ने मिलकर अलग-अलग समुदाय बनाए, वर्ग पहचाने, जाति पहचानी, मत पहचाने और अपने आप को सुखी रखने का अथक प्रयास किया। लेकिन इतने प्रयासों के बाद भी दो मानवों के बीच ईर्ष्या, द्वेष, भय खत्म नहीं हो पाया। यही क्लेश जब विकराल रूप लेता है, तो दो मानसिकताओं के बीच इतना टकराव होता है, इतना फैलाव होता है कि वह युद्ध तक चला जाता है। ऐसे में अखंड समाज का सपना, “वसुधैव कुटुम्बकम” की चाहत पूरी होती नहीं दिखती, क्योंकि युद्ध जब भी होता है तो वह दूसरे के शरीर को खत्म करता है, उसकी मानसिकता में कोई बदलाव नहीं लाता है।
युद्ध करने से भय और प्रलोभन बढ़ता है और भय, प्रलोभन से कोई व्यवस्था बनती नहीं। भय और प्रलोभन के कारण ही एक देश दूसरे देश के साथ युद्ध करता है। इसलिए कुछ देश भय-प्रलोभन के कारण युद्ध में लिप्त हैं और कुछ देश व्यवस्था बनाने के संकल्प के साथ युद्ध कर पूरी दुनिया को यह दिखाते हैं कि युद्ध व्यवस्था के लिए किया जा रहा है। युद्ध भय और प्रलोभन को बढ़ाता है, इसका पहला लक्ष्य भी भय और प्रलोभन होता है और युद्ध के बाद भी यही भय और प्रलोभन बने रहते हैं। इसलिए भय और प्रलोभन से व्यवस्था नहीं बन सकती। यह हमें स्वीकार करना होगा और इस अनावश्यक प्रयास को छोड़कर एक ऐसा विकल्प देखना होगा जिससे अखंड समाज की व्यवस्था, जो हम सभी का लक्ष्य है, प्राप्त हो सके।
अब तक की शिक्षा प्रणाली में मानव की शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करने के तरीके समझाए गए हैं, लेकिन मानव की भावनात्मक आवश्यकताओं को कैसे पहचाना जाए और उन्हें कैसे पूरा किया जाए, यह अभी तक शिक्षा में नहीं आया है। इसी कारण हर जगह केवल भावनात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संसाधनों का दुरुपयोग हो रहा है और विभिन्न प्रकार के शस्त्र बनाए जा रहे हैं, जिसके कारण हर मानव के अंदर भय है, और वे एक-दूसरे का शोषण करते हैं। इसकी पराकाष्ठा युद्ध है।
एक बार स्वयं ही चिंतन कीजिए कि ऐसी कौन-सी जगह है जहां हवा, मिट्टी, पत्थर, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, मानव, संतुलित अवस्था में हैं? जबकि हर मानव के अंदर संतुलन की चाहत है। लेकिन संतुलन हो नहीं रहा है। इसका मुख्य कारण यही है कि मानव अभी संतुलन को समझ ही नहीं पाया है। यह एक बड़ी पीड़ा है जिसको ध्यान में रखने की बात है।
शिक्षा द्वारा ही हम यह समझ सकते हैं कि किस तरह इस पूरे अस्तित्व में व्यवस्था है, और उस व्यवस्था को समझकर उसके अनुरूप हमें अपना कार्य-व्यवहार करना है। शिक्षा द्वारा इसको लोकव्यापीकरण करना ही सबसे महत्वपूर्ण और जरूरी है। अखंड समाज की व्यवस्था की जिम्मेदारी किसी सरकार या व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि यह हर मानव की आवश्यकता और जिम्मेदारी है। इसलिए जब तक समाज में इसकी स्वीकृति नहीं होगी, सरकार कुछ नहीं कर सकती।
निष्कर्ष इस पूरी चर्चा से यही निकलता है कि हर मानव सुखी होना चाहता है, और जब सुखी होने में अड़चन आती है तो अशुभ होना स्वाभाविक है। भय की पराकाष्ठा एक मानव से परिवार, परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र तक जाती है, और फिर एक देश दूसरे देश के साथ युद्ध करता है ताकि वह सुखी रहे। सुखी रहने का एक ही तरीका है कि शिक्षा द्वारा मानव को उसका अधिकार मिले, जिसके वह अधिकारी हैं। इसके लिए समझदारी, पोषण और संरक्षण आवश्यक है ताकि हर मानव एक समझदार, ईमानदार, जिम्मेदार और उपयोगी नागरिक बन सके।
School of Co-Existence
Pitampura,Delhi,India