प्रेम जो है मानव चेतना में जीने की स्वीकृति है जो अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी के अर्थ में नियम त्रय पूर्वक जी कर प्रमाणित होती है

इसका प्रमाण परिवार में समाधान समृद्धि पूर्वक जीना है

जिसमें सभी संबंध प्रमाणित होते हैं पति-पत्नी संबंध में उनमें ही एक है

सभी संबंधों में विश्वास और प्रेम अनिवार्य है

स्वयं में विश्वास पूर्वक अर्थात मानव चेतना में विश्वास पूर्वक जी करके व्यवस्था में भागीदारी प्रेम का प्रमाण है और परिवार व्यवस्था की मूल
इकाई है

परिवार में फिर हर संबंध का प्रयोजन है उसे प्रयोजन के अर्थ में जीना ही प्रेम विश्वास सम्मान का प्रमाण है हर मानव मानवीय चेतना में जीकर अपनी-अपनी गरिमा को प्रमाणित करेगा मानव के रूप में और परस्पर पुरकता पूर्वक प्रेम को प्रमाणित करेगा व्यवस्था के अर्थ में 🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹

Sunita Pathak ji

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