श्रद्धेय ए. नागराज - कृतज्ञता
तत्सान्निध्य स्मृत में से गुरु, पुलकित हो उठता मेरा मन,
मंद-मधुर मुस्कान मुखर, गुनगुनाए-गाए गान गहन।
मद मयूर सम नृत्य करे, देख झलक प्रकृति संप्रक्त ज्ञान,
हमजोली सब हों प्रतीत, अवस्था ज्ञान, जीव, पदार्थ, प्राण।
ब्रह्माण्ड, सौर-मंडल छटा निराली, ज्ञान कपट से रहे निहार,
अग्नि, वायु, जल संग क्रीड़ा, झूमे संग धरती और गगन।
तत्सान्निध्य स्मृत में से गुरु, पुलकित हो उठता मेरा मन।
उत-इत इतराए, इठलाए, बौराए, जब तव महिमा का करे बखान,
पर अंश ही हूँ, है आंशिक भागीदारी, स्व को समग्र में निहित जान।
हो उत्साहित और प्रफुल्लित, समर्पित शिक्षा और व्यवस्था में,
यही पूजा-पाठ, जप-ताप समझे, यही भक्ति साधना और भजन।
तत्सान्निध्य स्मृत में से गुरु, पुलकित हो उठता मेरा मन।
अनवरत विकास व जाग्रत की, चिर यात्रा सुखद और सुहानी,
तव पुरुषार्थ व परमार्थ से, माने धन्य सुन सम्पूर्ण ज्ञान।
पाई प्रशस्त परंपरा, सर्वतोमुखी समाधान सर्वसमृद्धि का,
रह-रह कर हो भाव-नवहल, शत-शत वंदन करे कोटि नमन।
तत्सान्निध्य स्मृत में से गुरु, पुलकित हो उठता मेरा मन।