प्रभाव
- सुरेंद्र पाल
ठीक ८ बजकर ४० मिनट पर सुरेंद्र भाई अपने कमरे से बाहर निकल कर राकेश भाई के साथ धीरे-धीरे पांडाल की ओर चल पड़े थे। उन्होंने गत शाम को ही उस दिन के सत्र संचालन, वंदना तथा गीत के लिए जिम्मेदार भाई व बहन को सही ८:४५ पर मिलने का तय कर लिया था और प्रसन्नता पूर्वक तय समय ९:१५ पर वंदना के साथ सम्मेलन को प्रारंभ करने के निर्णय को सफल करने के लिए तत्पर थे। साथ ही, अपनी समय प्रतिबद्धता वाली छवि को भी बरकरार रखने का विचार था।
स्वागत डेस्क के पास से गुजरते हुए पांडाल की ओर चलते-चलते उन्होंने सम्मेलन स्थल पर चारों ओर एक उथली सी दृष्टि डाली और देखा कि मौसम अत्यधिक सुहावना था, सुबह की धूप दिशाओं में बिखरी हुई सौम्य लग रही थी। स्थल के चारों ओर घने आम के वृक्ष भी पवन वेग के अभाव में निश्चल थे। सम्मेलन में पधारे हुए अधिकांश भाई-बहन नाश्ता कर चुके थे और छोटे-छोटे समूह में सुखद वार्तालाप में व्यस्त थे। सभी के चेहरे पर मुस्कराहट फैली हुई थी तथा मित्रों से मिलने की प्रसन्नता से सरोबार नजर आ रहे थे। वार्तालाप के दौरान कभी-कभी पांडाल की ओर भी देख लेते थे—शायद कार्यक्रम के प्रारंभ होने की उत्सुकता थी। आखिर क्यों न हो, वर्ष में एक बार ही तो अपने कई ऐसे भाई-बहनों को सुनने का अवसर प्राप्त होता है जिन्हें अन्यथा नहीं सुन पाते।
इस खुशनुमा वातावरण का आस्वादन लेते हुए सुरेंद्र भाई पांडाल के प्रवेश द्वार पर पहुंचे। वहां का दृश्य देखकर उनकी सांस जैसे अटक सी गई। ठीक सामने स्टेज पर कुछ भाई सीढ़ी पर चढ़कर सम्मेलन का बैनर लगा रहे थे, तो ऑडियो सिस्टम वाले अपने यंत्रों की टेस्टिंग कर रहे थे। सामने लगी वीडियो स्क्रीन अभी तक किसी भी तरह की हलचल से रहित थी। और तो और, पांडाल व्यवस्था हेतु ठेकेदार द्वारा भेजे गए चार भाइयों में से दो तो एक तरफ खड़े इस तरह ऊंघ रहे थे जैसे उन्होंने रातभर खेत में हल चलाया हो और दो भाई मिलकर गद्दों को जमीन पर कुछ ऐसे लगा रहे थे जैसे शास्त्रीय संगीत के गायक गायन के प्रारंभ में धीमी गति से आलाप ले रहे हों। दो या चार गद्दे ही अभी तक जमीन पर बिछे हुए थे। कुर्सियां तो पांडाल के एक कोने में झुंड में पड़ी हुई थीं।
सम्मेलन का समय पर प्रारंभ होना तो दूर की बात लगती थी, अब तो यही चिंता थी कि किसी तरह जल्द से जल्द शुरुआत हो सके। एक साथ कई विचार आने लगे कि खुद ही राकेश भाई के साथ मिलकर कुर्सी-गद्दे लगवाने लग जाएं या फिर कुछ और साथियों को बुला लिया जाए। ऑडियो-वीडियो के बारे में तो कुछ भी जानकारी नहीं थी, इसके लिए शायद अंकित भाई को बुलाना ठीक रहेगा, इत्यादि। सुरेंद्र भाई ने स्वयं को एक बार फिर शंका-कर्तव्य-तबूद्ध स्थिति में पाया।
इस तरह की स्थिति में पूर्व अभ्यास तो कुछ ऐसा था कि जो भी सामने आए, उसे जोर से डांट लगाई जाए, खूब हंगामा कर आसमान सिर पर उठा लिया जाए और बलि का बकरा ढूंढकर उसे सूली पर चढ़ा दिया जाए। इस तरह की कई पूर्व वृत्तियां उनके मस्तिष्क में बिजली की तरह कौंध गईं। परंतु, अब मध्यस्थ दर्शन का पठन, और कुछ हद तक चिंतन करने से एक बात पूर्ण स्पष्ट हो गई थी कि क्रोध तो अपनी अक्षमता का ही प्रदर्शन है तथा किसी भी स्थिति में दूसरों को दोष देने की बजाय समाधानपूर्वक स्वयं के करने हेतु मार्ग निकाला जाए।
इस उधेड़बुन में मोबाइल फोन की घड़ी पर नजर डाली तो पाया कि ९ बज चुके थे।
कुछ अनुमान लगाकर वह राकेश भाई को साथ लेकर तुरंत ही स्टेज पर पहुंचकर खड़े हो गए और वहां कार्यरत भाइयों से, जो थोड़े घबराए या तनाव में लग रहे थे, मुस्कराकर कहा, “यह बैनर तो ठीक ही लग गया है, इतने से काम चल सकता है।” उन्होंने प्रत्युत्तर में कहा कि “बस एक जगह और फिक्स कर देते हैं।” बैनर की ओर से आश्वस्त होकर उन्होंने गद्दे लगाने वाले भाइयों से निवेदन किया कि वे जमीन का काम छोड़कर पहले चार से छह गद्दे स्टेज पर लगा दें। उन्होंने कुछ शांत नजरों से देखते हुए स्टेज पर गद्दे लगा दिए। अब उन्होंने ऑडियो वाले भाई से माइक स्टेज पर लगाने का निवेदन किया, जो तुरंत ही लगा दिए गए। तत्पश्चात, उन्होंने सत्र संचालन टीम व काशी की टीम, जो वंदना व गीत गायन के लिए कुछ समय पहले से ही उपस्थित हो चुकी थी, को मंच पर आमंत्रित कर लिया। मंच पर उपस्थित इतने लोगों को प्रस्तुत मुद्रा में देखकर ठेकेदार द्वारा भेजे गए भाइयों को जैसे करंट लग गया हो! दो भाइयों ने मिलकर गद्दे तथा अन्य दो ने कुर्सियां लगाना शुरू कर दिया। अब उनके हाथ-पैर ऐसे चल रहे थे जैसे शास्त्रीय गायक द्रुत गति में तान छेड़ते हैं। ऊंघ और आलस्य तो छू-मंतर हो गया था। जब ९ बजकर २० मिनट पर वंदना प्रारंभ हुई, तब मंच के सामने बैठने के लिए गद्दे बिछ चुके थे तथा आधे से ज्यादा कुर्सियां लग चुकी थीं, और सम्मेलनार्थियों ने अपना स्थान लेना शुरू कर दिया था। गीत के समाप्त होते-होते तो पांडाल खचाखच भर गया था।
उसके पश्चात आगे के सभी कार्यक्रम सुचारू रूप से संपन्न हुए। सम्मेलन के अंतिम दिन समापन सत्र में दिनेश भाई ने सम्मेलन के सारांश के साथ कार्यक्रम में भागीदारी निभाने वाले लोगों का प्रतिवेदन भी प्रस्तुत किया। इसमें उन्होंने बताया कि जब उन्होंने पांडाल में गद्दे व कुर्सी लगाने वाले भाइयों से पूछा था कि उन्हें यह कार्यक्रम कैसा लगा, तब उनका जवाब इस प्रकार था:
“साहब, हम तो डांटने के लिए ही बने हैं। जब भी किसी शादी या अन्य सामाजिक उत्सव में काम करने जाते हैं, तो हमें हर कोई डांटता है। यहां हमें किसी ने भी डांट नहीं लगाई, यह बहुत अच्छा लगा।”
बाद में, काशी व्यवस्था टीम से वार्तालाप के दौरान पता चला कि पांडाल की व्यवस्था करने में कई अड़चनें आई थीं तथा ठेकेदार ने पांडाल का सामान सम्मेलन की पूर्व रात १० बजे ही भेजा था, और उसके द्वारा भेजे भाइयों ने रातभर काम कर पांडाल खड़ा किया था।
अर्थ ग्रहण
१. पांडाल पहुंचकर सुरेंद्र भाई की सांस क्यों अटक गई?
२. पांडाल में गद्दे व कुर्सियां लगाने वाले भाइयों की ऊंघ व आलस्य का क्या कारण था?
३. सुरेंद्र भाई ने मंच पर पहुंचकर जो किया, वह क्यों किया?
४. सम्मेलन में आए सभी लोग क्यों खुश नजर आ रहे थे?
५. “साहब, हम तो डांटने के लिए ही बने हैं” का क्या आशय है? इसे सुनकर आपके क्या विचार आते हैं?
६. आप अपनी किस छवि को बनाए रखने का प्रयास करते हैं?
७. इस घटना से आपको क्या प्रेरणा मिलती है?
शब्दार्थ
१. निम्नलिखित शब्दों व शब्द समूहों के अर्थ अध्यापक/अध्यापिका व अभिभावकों की सहायता से स्पष्ट करें व उन्हें अपनी पुस्तक में लिखें:
प्रतिबद्धता, सरोबार, पवन, आलाप, द्रुत, प्रतिभाव।
२. मुहावरे:
खेत में हल चलाना, आसमान सिर पर उठाना, बलि का बकरा, सूली चढ़ाना, बिजली कौंधना, करंट छूना, छू-मंतर होना, तान छेड़ना।
सुरेंद्र पाल