सह-अस्तित्व ही मात्र शरण


अति सूक्ष्म तिषाणु से हो त्रि-पि,
सामान्य जीवन हुआ अ-व्यथि |
किंकर्तव्यविमूढ़ समस्त जन-गण,
अब सह-अस्तित्व ही मात्र शरण |

है गहन अवसाद से मन भरा हुआ,
नित-नयी आशंकाओं से डरा हुआ |
फुरसत होती दीखे, सब मजा, मौज–मस्ती,
बल्कि दूभर, किंचित भरण-पोषण |

हे मानव, सह-अस्तित्व ही मात्र शरण
घनघोर तिमिर, न सूझे कोई राह,
रह-रह कर गूंजे अनिनाद आह
शमशान भूमि सा लगे नगर,
जन-जीवन में बस रोग-मरण
है, सह-अस्तित्व ही मात्र शरण


अब तो संभलें, समझें जीना साथ,
नफर परिवर्तन, विनाश या जीवन-साध |
हो ज्ञान संपन्न, पहचाने लक्ष्य,
समाधान–समृद्धि सब करें वरण |

सह-अस्तित्व ही है मात्र शरण
सिंचित आवश्यकताएं, साधन भी पर्याप्त,
भ्रम बस ही, धरती बलात आघात
आवश्यक उत्पादन, संतुलित संसाधन,
और सुनिश्चत, प्रकृति संरक्षण, संवर्धन
सह-अस्तित्व ही है मात्र शरण


हो न्याय, धर्म, सत्य की, समझ स्वीकृति,
मानव संबंधों में व्यक्त निरंतर तृप्ति |
मानवीय शिक्षा और व्यवस्था से,
अखंड समाज का हो, शुभ पदार्पण |
सह-अस्तित्व ही है मात्र शरण ||

Surendra Pal ji

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