सह-अस्तित्व ही मात्र शरण
अति सूक्ष्म तिषाणु से हो त्रि-पि,
सामान्य जीवन हुआ अ-व्यथि |
किंकर्तव्यविमूढ़ समस्त जन-गण,
अब सह-अस्तित्व ही मात्र शरण |
है गहन अवसाद से मन भरा हुआ,
नित-नयी आशंकाओं से डरा हुआ |
फुरसत होती दीखे, सब मजा, मौज–मस्ती,
बल्कि दूभर, किंचित भरण-पोषण |
घनघोर तिमिर, न सूझे कोई राह, | |
रह-रह कर गूंजे अनिनाद आह | |
शमशान भूमि सा लगे नगर, | |
जन-जीवन में बस रोग-मरण | |
है, सह-अस्तित्व ही मात्र शरण |
अब तो संभलें, समझें जीना साथ,
नफर परिवर्तन, विनाश या जीवन-साध |
हो ज्ञान संपन्न, पहचाने लक्ष्य,
समाधान–समृद्धि सब करें वरण |
सिंचित आवश्यकताएं, साधन भी पर्याप्त, | |
भ्रम बस ही, धरती बलात आघात | |
आवश्यक उत्पादन, संतुलित संसाधन, | |
और सुनिश्चत, प्रकृति संरक्षण, संवर्धन | |
सह-अस्तित्व ही है मात्र शरण |
हो न्याय, धर्म, सत्य की, समझ स्वीकृति,
मानव संबंधों में व्यक्त निरंतर तृप्ति |
मानवीय शिक्षा और व्यवस्था से,
अखंड समाज का हो, शुभ पदार्पण |
सह-अस्तित्व ही है मात्र शरण ||