भ्रमित जीवन (समीक्षा)
टिप्पणी: प्रस्तुत रचना प्रचलित हिंदी मुहावरों को सजा कर स्वयं पर हास्य-व्यंग्य प्रारूप में है। यहाँ, “हम” से आशय मेरे मन, वृत्ति, मति एवं बुद्धि से है। किसी भी मृत अथवा जीवित व्यक्ति/व्यक्तियों, संस्थान या समुदाय से समानता मात्र संयोग है।
- सुरेंद्र पाल
भ्रमित जीवन (नकारात्मक)
यों तो हम चक्रवर्ती राजा हैं, यद्यपि अंधों में काने हैं,
डगमगाती अपनी नैया है, पर जग तारण की ठाने हैं।
कानों की अपनी बीन है, पर न वो एक आँख सुहाते हैं,
उनके संग आँख-मिचौली है, और टेढ़े-टेढ़े ताने-बाने हैं।
डगमगाती अपनी नैया है, पर जग तारण की ठाने हैं।।
अपनी-अपनी ढपली है, अपने-अपने सुर और राग,
‘वाह-वाह’ करने वाले अपने, और छेड़ी अपनी तानें हैं।
डगमगाती अपनी नैया है, पर जग तारण की ठाने हैं।।
एक थैली के चट्टे-बट्टे, एक घाती हैं, पंछी भी एक डाल के,
थोड़े-थोड़े, चोर-चोर मौसेरे भाई, फिर क्यों भेद छिपाने हैं?
डगमगाती अपनी नैया है, पर जग तारण की ठाने हैं।।
अधजल गगरी, सावन अंधे, न घुले दूध के, न गंगा नहाए,
ना ही टपके आसमान से, किस पर क्या आरोप लगाने हैं?
डगमगाती अपनी नैया है, पर जग तारण की ठाने हैं।।
न श्रुति-श्री, न स्मृति-श्री, और न ही अनुभव-बोध श्री,
न चक्र, न रत्न, न भूषण-विभूषण, व्यर्थ ही अश्व दौड़ाने हैं।
डगमगाती अपनी नैया है, पर जग तारण की ठाने हैं।।
ना देर हुई, दुरुस्त भी हैं, जब जागें तभी सवेरा,
कभी के भटके जब भी घर लौटें, बुद्ध नहीं, सयाने हैं।
डगमगाती अपनी नैया है, पर जग तारण की ठाने हैं।।
मौका है, दस्तूर भी है, मोह तो बस गढ़ी हुई ही है,
शुभ वेदना भी हर पल-क्षण है, अब नहीं कोई बहाने हैं।
अब संभालें अपनी नैया भी, और जग तारण को ठाने हैं।।
एक टोली के सब संगी-साथी, एक नाव में सभी सवार,
झिझक-झिझक कर बढ़ेगी नैया, बस मिलकर पतवार चलाने हैं।
खुलशियों से जो झिझके नैया, फिर लोग तो पीछे आने हैं।।
बैठें हिल-मिल संग-संग सभी, अंतर्मन की सुने सुनाएं,
शिक्षा एक और मार्ग एक है, पग भी साथ बढ़ाने हैं।
खुलशियों से जो झिझके नैया, फिर लोग तो पीछे आने हैं।।
अखंड समाज में सुखी परिवार, समस्त शुभ में स्व-शुभ हेतु,
शिक्षा और व्यवस्था में जुट, मानव व जीवन लक्ष्य पाने हैं।
खुलशियों से जो झिझके नैया, फिर लोग तो पीछे आने हैं।।
अभी मन है लिप्त विषयों में, वृत्ति निरर्थक करे विचार,
मति लिप्त सांसारिक तकलीफ में, बुद्धि तो चुप्पी ठाने है।
डगमगाती अपनी नैया है, पर जग तारण की ठाने हैं।।
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भ्रमित जीवन (सकारात्मक)
न कहीं की ईंट, न कहीं का रोड़ा, यह कुनबा है विचारों का,
यह वसुधा सुंदर स्वर्ग बने, सब इसमें दिन-रात खपाते हैं।
रंग-बिरंगे खिले पुष्प भिन्न, सुगंध सबकी प्यारी-न्यारी,
झिझकते-इठलाते, जहाँ जैसे हैं, वहाँ वातावरण महकाते हैं।
यह वसुधा सुंदर स्वर्ग बने, सब इसमें दिन-रात खपाते हैं।।
तंत्री, मृदंग, वीणा या तबला, भोंपू जैसे अनेक साज,
द्रुत, मध्य, विलंबित, तान हो, धुन तो सब एक बजाते हैं।
यह वसुधा सुंदर स्वर्ग बने, सब इसमें दिन-रात खपाते हैं।।
दिया, लालटेन, पेट्रोमैक्स, बल्ब, या फिर नन्हा सा जुगनू,
है सबकी सार्थकता भिन्न, पर अंधकार सब दूर भगाते हैं।
यह वसुधा सुंदर स्वर्ग बने, सब इसमें दिन-रात खपाते हैं।।
पुष्प मिलें तो बगिया महके, साज मिलें हो संगीत सज्जा,
प्रकाश पुंज सब मिल जग का, कोना-कोना जगमगाते हैं।
यह वसुधा सुंदर स्वर्ग बने, सब इसमें दिन-रात खपाते हैं।।
मन लगे अध्ययन में, न्याय-नीति का वृत्ति करे विचार,
मति में धैर्य, बुद्धि में स्व, सत्यानुभव में सभी नहाते हैं।
यह वसुधा सुंदर स्वर्ग बने, सब इसमें दिन-रात खपाते हैं।।